जबलपुर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने मानवीय संवेदनाओं को ध्यान में रखते हुए एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत प्रतिपादित किया है। जस्टिस विवेक जैन की एकल पीठ ने कहा है कि एक 85 वर्षीय बुजुर्ग से यह उम्मीद करना कि वह युवाओं जैसी तेजी और सक्रियता दिखाए, व्यावहारिक नहीं है। केवल एक पेशी पर उपस्थित न हो पाने के कारण किसी वृद्ध व्यक्ति का कानूनी अधिकार समाप्त नहीं किया जा सकता।
-क्या है मामले की पूरी कहानी
यह कानूनी विवाद टीकमगढ़ के संतोष कुमार बादल और सुरेश चंद्र जैन के बीच साल 2015 से चल रहा था। संपत्ति विवाद से जुड़े इस मामले में जब जुलाई 2015 में गवाही होनी थी, तब बुजुर्ग याचिकाकर्ता और उनके वकील कोर्ट नहीं पहुँच सके थे। इस पर निचली अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए मुकदमा खारिज कर दिया था। याचिकाकर्ता ने 48 दिन की देरी से बीमारी का हवाला देते हुए आवेदन दिया था, जिसे निचली अदालत ने यह कहकर ठुकरा दिया था कि उनके परिजन साथ रहते थे, इसलिए देरी का कारण विश्वसनीय नहीं है। हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता की उम्र और बीमारी के दस्तावेजों को सही माना और निचली अदालत व अपीलीय न्यायालय के आदेशों को रद्द कर दिया। माननीय न्यायालय ने अब इस मामले को फिर से बहाल कर दिया है और बुजुर्ग को 23 फरवरी की अगली सुनवाई में अपना पक्ष रखने का मौका दिया है।
