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मप्र OBC आरक्षण: सुप्रीम कोर्ट में कल अंतिम सुनवाई; 27% कोटे और 'होल्ड' पदों पर आ सकता है बड़ा फैसला


जबलपुर।
 मध्य प्रदेश में लंबे समय से लंबित 27% ओबीसी आरक्षण के विवाद पर  21 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में निर्णायक सुनवाई होने जा रही है। जस्टिस नार्सिम्म्हा तथा जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ उन सभी प्रकरणों की सुनवाई करेगी, जिनमें राज्य सरकार के 27% आरक्षण कानून को चुनौती दी गई है। उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार ने खुद हाईकोर्ट से इन मामलों को सुप्रीम कोर्ट ट्रांसफर कराया था, लेकिन अब बहस के लिए बार-बार समय मांगने के कारण मामले लंबित बने हुए हैं। बुधवार की सुनवाई यह तय करेगी कि क्या सुप्रीम कोर्ट खुद इस पर अंतिम फैसला सुनाएगा या अभ्यर्थियों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए इसे वापस हाईकोर्ट को सौंप देगा।

 87-13% का फॉर्मूला और 'होल्ड' का विवाद

​मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण का कानून 14 अगस्त 2019 को पारित हुआ था। ताज्जुब की बात यह है कि इस कानून पर न तो हाईकोर्ट ने और न ही सुप्रीम कोर्ट ने कभी 'स्टे' (रोक) लगाया है। इसके बावजूद, राज्य सरकार ने विभिन्न आरटीआई जवाबों में हाईकोर्ट के पुराने अंतरिम आदेशों का हवाला देकर 27% आरक्षण लागू करने से हाथ खड़े कर लिए हैं। वर्तमान में सरकार 87:13 का फॉर्मूला अपना रही है, जिसमें 87% पदों पर नियुक्तियां दी जा रही हैं, जबकि 13% ओबीसी और 13% अनारक्षित पदों को 'होल्ड' पर रखा गया है। इन अभ्यर्थियों को न तो उनके प्राप्तांक बताए जा रहे हैं और न ही परिणाम।

हाईकोर्ट को मामला वापस भेजने का विकल्प

​पिछली दो सुनवाइयों के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की थी कि राज्य के कानून की संवैधानिकता का परीक्षण सबसे पहले अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट को करना चाहिए। कोर्ट ने प्रस्ताव दिया था कि सभी अंतरिम आदेशों को निरस्त कर मामला मेरिट पर निर्णय के लिए हाईकोर्ट को प्रत्यावर्तित (रिमांड) कर दिया जाए। हालांकि, इसके लिए मध्य प्रदेश सरकार की सहमति आवश्यक है क्योंकि ये मामले सरकार की ही याचिका पर दिल्ली ट्रांसफर हुए थे, जिस पर अभी तक सरकार ने स्पष्ट रुख नहीं अपनाया है।

कानूनी बाधा नहीं, फिर भी लागू करने में हिचक

​ओबीसी वर्ग की ओर से पक्ष रख रहे वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर का कहना है कि 27% आरक्षण लागू करने में वर्तमान में कोई कानूनी बाधा नहीं है। चूंकि कानून पर कोई स्टे नहीं है, सरकार चाहे तो विचाराधीन याचिकाओं के अंतिम निर्णय के अधीन 27% आरक्षण लागू कर सकती है और होल्ड किए गए पदों को 'अनहोल्ड' कर नियुक्तियां दे सकती है। अभ्यर्थियों का आरोप है कि सरकार एक तरफ विज्ञापन 27% के हिसाब से निकाल रही है, लेकिन नियुक्तियां केवल 14% पर ही दी जा रही है।​ 

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