जबलपुर। पूर्व महापौर प्रभात साहू और पुलिसकर्मी के बीच हुए विवाद मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। केस डायरी और दस्तावेजों का बारीकी से अवलोकन करने के बाद चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रथम दृष्टया दोनों ओर से दर्ज एफआईआर में निष्पक्ष और उचित जांच नहीं की गई है। इस टिप्पणी के साथ ही अदालत ने अब इस पूरे प्रकरण की जांच एसटीएफ को सौंपने के निर्देश दिए हैं।
वर्दी फाड़ने का वीडियो होने पर भी अज्ञात पर एफआईआर
सुनवाई के दौरान अधिवक्ता मोहित वर्मा ने दलील दी कि इंटरनेट मीडिया पर वायरल वीडियो में पूर्व महापौर प्रभात साहू द्वारा पुलिसकर्मी की वर्दी फाड़ने के स्पष्ट साक्ष्य मौजूद हैं। इसके बावजूद पुलिस ने नामजद रिपोर्ट दर्ज करने के बजाय 'अज्ञात' लोगों के विरुद्ध प्रकरण दर्ज किया। दूसरी ओर, पुलिसकर्मी के विरुद्ध तत्काल नामजद एफआईआर दर्ज कर उसे निलंबित कर दिया गया। कोर्ट ने पाया कि मेडिकल रिपोर्ट और केस डायरी के तथ्य आपस में मेल नहीं खा रहे हैं, जो पुलिस की जांच पर संदेह पैदा करते हैं।
कोर्ट में पेश हुए अधिकारी, पूर्व -महापौर की ओर से कोई नहीं आया
पिछली सुनवाई के निर्देशों का पालन करते हुए लार्डगंज टीआई नवल आर्य और एसआई लेखराम नाडोनिया केस डायरी के साथ अदालत में उपस्थित हुए। हालांकि, नोटिस जारी होने के बावजूद पूर्व महापौर प्रभात साहू की ओर से पैरवी के लिए कोई भी हाजिर नहीं हुआ। अदालत ने केस डायरी के साथ-साथ मेडिकल रिपोर्ट का भी मिलान किया और पाया कि निष्पक्षता का अभाव है, जिसके चलते जांच का जिम्मा स्थानीय पुलिस से छीनकर एसटीएफ को दिया गया है।
क्या है पूरा मामला
यह विवाद बल्देवबाग के पास वाहन चेकिंग के दौरान शुरू हुआ था। याचिका के अनुसार, जब ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी ने पूर्व महापौर प्रभात साहू को रोका, तो वे अभद्रता करने लगे। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ था, जिसमें वर्दी फाड़ने और विवाद के दृश्य थे। इस मामले में पुलिस ने पुलिसकर्मी पर तो कड़ी कार्रवाई की, लेकिन रसूखदार पक्ष के खिलाफ जांच में ढिलाई बरती। अब इस मामले की अगली सुनवाई 17 फरवरी को तय की गई है।
