मेरिट बनाम आरक्षण: पदोन्नति के प्रतिनिधित्व पर जबलपुर हाईकोर्ट में तीखी बहस, फैसला जल्द


जबलपुर
। मध्य प्रदेश में पदोन्नति में आरक्षण नियम 2025 को लेकर जबलपुर हाईकोर्ट में मंगलवार को महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच के सामने मामले से जुड़ी सभी मुख्य याचिकाओं पर बहस की गई। कोर्ट ने अब इस मामले की अगली और संभवतः अंतिम सुनवाई के लिए 3 फरवरी की तारीख तय की है।सुनवाई के दौरान मार्केटिंग बोर्ड के जॉइंट डायरेक्टर सुरेश कुमार कुमरे द्वारा दायर एक नई याचिका पेश की गई। राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि लगातार नई याचिकाएं आने से मुख्य मामले का फैसला टल रहा है। कोर्ट की टिप्पणियों के बाद इस याचिका को वापस ले लिया गया। सरकार ने कोर्ट से पुरानी अंडरटेकिंग वापस लेने का भी आग्रह किया ताकि पदोन्नति की प्रक्रिया शुरू हो सके, जिस पर कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में स्थगन आदेश पर विचार करना होगा।

​प्रशासनिक संकट और रिक्त पदों का हवाला

महाधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि प्रदेश के 54 विभागों में क्लास-1 और क्लास-2 के कुल 14,860 पदों में से 8,688 पद खाली हैं। वर्तमान में सरकार केवल 40 प्रतिशत अधिकारियों के साथ काम कर रही है, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित हो रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि याचिकाओं में केवल 8 कैडर का हवाला दिया गया है, जबकि प्रदेश में कुल 1500 कैडर हैं।

​प्रतिनिधित्व की गणना पर विवाद

बहस का मुख्य केंद्र आरक्षित वर्ग के प्रतिनिधित्व की गणना रही। आरक्षित वर्ग के वकीलों का तर्क था कि मेरिट से पदोन्नति पाने वालों को आरक्षण कोटे में नहीं गिना जाना चाहिए। वहीं, अनारक्षित वर्ग ने तर्क दिया कि बिना ठोस डेटा के यह तय करना मुश्किल है कि किसने कब आरक्षण का लाभ लिया है। कोर्ट को चार्ट के जरिए समझाया गया कि आरक्षण केवल निर्धारित प्रतिशत की सीमा में रिक्त पदों पर ही दिया जा सकता है। अब 3 फरवरी को दोपहर 12:30 बजे सरकार इस मामले में अपना अंतिम पक्ष रखेगी।

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