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'प्रायोजित' याचिकाओं पर हाईकोर्ट सख्त, बुरहानपुर की पीआईएल खारिज


हाईकोर्ट ने कहा अपनी रंजिश भुनाने के लिए नहीं है जनहित याचिका

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने जनहित याचिकाओं  के दुरुपयोग पर कड़ी नाराजगी जाहिर की है। बुरहानपुर में अवैध रेत उत्खनन से जुड़ी एक याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल किसी व्यक्ति विशेष से बदला लेने के लिए नहीं किया जा सकता। ​बुरहानपुर निवासी वीरेंद्र पाटिल ने हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि खनन माफिया और प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत से अवैध उत्खनन हो रहा है।​ सरकार को रॉयल्टी का चूना लगाया जा रहा है।​जानबूझकर रेत की किल्लत पैदा कर कीमतें बढ़ाई गई हैं, जिससे आम जनता परेशान है। इस मामले में पूर्व कलेक्टर भाव्या मित्तल और खनिज विभाग के कई अधिकारियों को पक्षकार बनाया गया था। ​सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी ने दलीलें पेश कीं। कोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद सोमवार को अपना अंतिम फैसला सुनाते हुए याचिकाकर्ता को कोई भी राहत देने से इनकार कर दिया।

​कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका

​जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने मामले की गहराई से जांच के बाद पाया कि यह जनहित याचिका जनसेवा के बजाय 'प्रायोजित' अधिक लग रही थी। कोर्ट ने अपने फैसले में मुख्य रूप से तीन बातें कहीं। याचिका केवल एक विशेष ठेकेदार और अधिकारियों को निशाना बनाने के उद्देश्य से लगाई गई थी।  कोर्ट ने माना कि यह मामला व्यक्तिगत दुश्मनी का बदला लेने के लिए कानून का सहारा लेने जैसा है। अवैध खनन रोकने के लिए प्रशासन और कानून में पहले से ही पर्याप्त प्रावधान मौजूद हैं, ऐसे में दुर्भावनापूर्ण याचिकाओं को प्रोत्साहन नहीं दिया जा सकता।

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