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हाईकोर्ट ने खारिज की 'संदिग्ध वसीयत', कहा- गरीबों का संरक्षण जरूरी


जबलपुर।
 एक महत्वपूर्ण फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि फर्जी वसीयतों को कानूनी मान्यता दी जाने लगी, तो समाज के शक्तिशाली और अमीर लोगों के लिए गरीबों की संपत्तियों पर अवैध कब्जा करना बेहद आसान हो जाएगा। जस्टिस रत्नेश चंद्र सिंह की एकल पीठ ने यह टिप्पणी 26 साल पुराने एक जमीन विवाद के मामले में फैसला सुनाते हुए की। न्यायालय ने जोर देकर कहा कि वसीयत की वैधता की गहन जांच अनिवार्य है ताकि न्याय की रक्षा हो सके।

26 साल पुराने मामले का निपटारा

यह पूरा विवाद सतना जिले की 10 एकड़ जमीन से संबंधित है, जिसका वास्तविक मालिक बुद्धसेन नामक व्यक्ति था। मामले के अनुसार, रमेश प्रताप सिंह (अब दिवंगत) ने बुद्धसेन की एक कथित वसीयत पेश की थी, जो 18 सितंबर 2025 की बताई गई थी। इसी दस्तावेज के आधार पर जमीन का नामांतरण भी करा लिया गया था। हालांकि, बुद्धसेन के परिजनों ने इसे जिला अदालत में चुनौती दी थी। वर्ष 2000 में एडीजे कोर्ट ने इस वसीयत को संदिग्ध मानते हुए नामांतरण को अवैध घोषित कर दिया था और जमीन बुद्धसेन के आश्रितों को सौंपने के आदेश दिए थे। इसी आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की गई थी। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि वसीयत में पारदर्शिता का अभाव गरीबों के अधिकारों को कुचल सकता है। इस फैसले से उन भू-माफियाओं को कड़ा संदेश गया है जो फर्जी दस्तावेजों के जरिए जमीन हड़पने की कोशिश करते हैं।

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