जबलपुर। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में लोकतंत्र नहीं, बल्कि पसंद का राज चल रहा है! बुधवार को जैसे ही डॉ. आरके बघेल की विदाई हुई, विवि प्रशासन ने एक ऐसा दांव चला जिसने कैंपस की राजनीति को गर्मा दिया है। सीनियरिटी और लंबी चौड़ी लिस्ट को दरकिनार करते हुए, कुलगुरु के सबसे खास माने जाने वाले प्रोफेसर डॉ. सुरेन्द्र सिंह को रजिस्ट्रार का ताज पहना दिया गया है। कैंपस की गलियों में सरेआम चर्चा है कि यह पद कोई जिम्मेदारी नहीं, बल्कि ईनाम है। डॉ. सिंह पहले से ही कौशल विकास संस्थान के सर्वेसर्वा थे, अब रजिस्ट्रार की चाबियां थमाकर उन्हें विवि का सर्वेसर्वा बना दिया गया है।
भोपाल की दहलीज पर विरोधी: कुर्सी की छीना-झपटी हुई तेज
डॉ. सिंह के कमरे में जब नए साल और नई कुर्सी के गुलदस्ते पहुंच रहे थे, ठीक उसी वक्त विवि के विरोधी खेमे में साजिशों का बाजार गर्म था। इस गुट का सीधा आरोप है कि विवि को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चलाया जा रहा है। विरोधियों ने हार नहीं मानी है। खबर है कि कुछ दिग्गज प्रोफेसरों ने भोपाल के वल्लभ भवन में डेरा डाल दिया है ताकि शासन से सीधे अपनी नियुक्ति का फरमान जारी करा सकें।
हाल ही में परीक्षा नियंत्रक पद से डॉ. रश्मि टंडन मिश्रा की जिस तरह 'छुट्टी' हुई और बाहर से लाकर डॉ. सुशील दुबे को बिठाया गया, उसके बाद रजिस्ट्रार पद पर डॉ. सिंह का कब्जा आग में घी डालने जैसा है। विरोधी खेमा तंज कस रहा है कि प्रशासन शासन के आदेश का इंतजार नहीं कर रहा, बल्कि अपनी सेटिंग पक्की कर रहा है। कुलगुरु प्रो. राजेश कुमार वर्मा भले ही इसे काम का बहाना बताकर पल्ला झाड़ रहे हों, लेकिन विवि के गलियारों में तनाव इतना है कि कभी भी प्रशासनिक विस्फोट हो सकता है। अब देखना यह है कि डॉ. सिंह अपनी कुर्सी बचा पाते हैं या भोपाल से आने वाला एक आदेश उनकी खुशियों पर पानी फेर देता है!
