रेलवे बोर्ड का 2006 का सर्कुलर 'बैक डेट' से लागू नहीं होगा, हाईकोर्ट ने 30% रनिंग अलाउंस की कटौती को ठहराया अवैध
जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने पश्चिम मध्य रेलवे के एक कर्मचारी के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस दीपक खोत की डिवीजन बेंच ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए रेलवे द्वारा कर्मचारी के वेतन से की गई 30% रनिंग अलाउंस की कटौती को अवैध करार दिया है। कोर्ट ने रेलवे को आदेश दिया है कि कर्मचारी से वसूली गई पूरी राशि 9% वार्षिक ब्याज के साथ तीन महीने के भीतर वापस की जाए।
2006 के सर्कुलर से शुरू हुई थी वसूली
याचिकाकर्ता जीतेन्द्र श्रीवास्तव, जो पश्चिम मध्य रेलवे में मोटरमैन (रनिंग कैटेगरी) के पद पर कार्यरत थे, उनका चयन RRB मुंबई के माध्यम से 9 मार्च 2000 को सेक्शन इंजीनियर (स्टेशनरी कैटेगरी) के रूप में हुआ था। नियुक्ति के समय नियमानुसार उनके मूल वेतन में 30% रनिंग अलाउंस जोड़कर वेतन निर्धारित किया गया था। हालांकि, सितंबर 2006 में रेलवे बोर्ड ने एक नया सर्कुलर जारी किया, जिसका हवाला देते हुए विभाग ने जीतेन्द्र श्रीवास्तव को मिल रहे इस लाभ को बंद कर दिया। इतना ही नहीं, रेलवे ने उनके वेतन से ₹2,581 प्रतिमाह की रिकवरी शुरू कर दी, जो कुल 72 किश्तों में काटी जानी थी।
हाईकोर्ट ने 'लिमिटेशन' की दलील नकारी
इससे पहले याचिकाकर्ता ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) में गुहार लगाई थी, लेकिन ट्रिब्यूनल ने याचिका को सीमाबद्धता के आधार पर खारिज कर दिया था, यानी इसे बहुत देर से दायर किया गया माना था। हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता के अधिवक्ता आकाश चौधरी ने दलील दी कि यह मामला निरंतर होने वाले नुकसान का है। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने CAT के उस आदेश को रद्द करते हुए कहा कि तकनीकी आधार पर कर्मचारी के जायज हक को नहीं छीना जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रेलवे बोर्ड का 15 सितंबर 2006 का सर्कुलर 'पूर्व प्रभाव' (Retrospective effect) से लागू नहीं होगा, क्योंकि उसमें खुद उल्लेख था कि पुराने मामले दोबारा नहीं खोले जाएंगे।
रनिंग अलाउंस वेतन का अभिन्न हिस्सा
अदालत ने अपने फैसले में भारतीय रेल स्थापना मैनुअल के पैरा 903 और 924 का हवाला दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रनिंग स्टाफ को मिलने वाला 30% अलाउंस केवल भत्ता नहीं, बल्कि 'पे एलिमेंट' (वेतन का हिस्सा) होता है। जब कोई रनिंग कर्मचारी किसी उच्च पद या स्टेशनरी पद पर नियुक्त होता है, तो उसके वेतन निर्धारण के समय इस हिस्से को अलग नहीं किया जा सकता।
