तथ्यों का खेल: बिजली कंपनियों ने दिखाया घाटा, एक्सपर्ट्स ने गिनाया 9125 करोड़ का मुनाफा


विद्युत नियामक आयोग में टैरिफ बढ़ोतरी को चुनौती, एक्सपर्ट्स ने खोली कंपनियों के भ्रामक घाटे की पोल

जबलपुर। मध्य प्रदेश पावर मैनेजमेंट कंपनी और प्रदेश की तीनों विद्युत वितरण कंपनियों द्वारा आगामी वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए बिजली की दरों में 10.19 प्रतिशत की भारी वृद्धि का प्रस्ताव दिया गया है। इसके विरोध में विद्युत मामलों के विशेषज्ञ और म.प्र. पावर जनरेटिंग कंपनी के सेवानिवृत्त अतिरिक्त मुख्य अभियंता एडवोकेट राजेंद्र अग्रवाल ने विद्युत नियामक आयोग के समक्ष कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। उन्होंने तथ्यों के साथ दावा किया है कि कंपनियों द्वारा बताया गया 6044 करोड़ रुपये का घाटा पूरी तरह भ्रामक है, बल्कि नियमतः गणना करने पर बिजली कंपनियां 9125 करोड़ रुपये के सरप्लस (अधिशेष) में हैं। जिससे दाम बढ़ने के बजाए घटने चाहिए।

दावा: अवैध मांगों ने बढ़ाया जनता का बोझ

​एडवोकेट राजेंद्र अग्रवाल और विशेषज्ञ राजेश चौधरी ने आयोग को सौंपी गई अपनी लिखित आपत्ति में 16 प्रमुख बिंदुओं पर प्रकाश डाला है। अग्रवाल का कहना है कि यदि नियामक आयोग विद्युत अधिनियम 2003 और अपने स्वयं के नियमों का कड़ाई से पालन करे, तो प्रदेश के उपभोक्ताओं के लिए बिजली दरें 15 प्रतिशत तक घटाई जा सकती हैं। उन्होंने तुलना करते हुए कहा कि ऐसा करने से मध्य प्रदेश में बिजली की दरें पड़ोसी राज्यों जैसे छत्तीसगढ़ और गुजरात के बराबर लाई जा सकती हैं। दस्तावेजों के अनुसार, बिजली कंपनियों ने सत्यापन याचिका के नाम पर लगभग 9300 करोड़ रुपये की ऐसी मांगें रखी हैं जिन्हें श्री अग्रवाल ने अवैध बताया है। 

क्या हैं मुख्य आपत्तियां 

​ पिछले 20 वर्षों के पुराने और पूर्व में खारिज हो चुके पूरक बिलों के नाम पर 3450 करोड़ रुपये की दोबारा मांग की गई है।  कोयले पर कंपनसेशन सेस समाप्त होने और जीएसटी युक्तियुक्तकरण से कंपनियों को 1875 करोड़ रुपये की बचत हुई है, जिसका लाभ उपभोक्ताओं को नहीं दिया जा रहा।  स्मार्ट मीटर के नाम पर भारत सरकार के निर्देशों के विपरीत 821 करोड़ रुपये और बिना किसी योजना के रिसर्च फंड हेतु 12 करोड़ रुपये की अनुचित मांग की गई है।

-​उपभोक्ताओं पर बोझ डालने के लिए मनगढ़ंत गणना

​राजेंद्र अग्रवाल ने आरोप लगाया है कि कंपनियां बिजली उपलब्धता की गणना मनगढ़ंत तरीके से कर रही हैं। रिन्यूएबल एनर्जी की उपलब्धता को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाकर 2000 करोड़ रुपये की अनावश्यक राशि मांगी गई है। इसके अलावा, घरेलू उपभोक्ताओं के लिए 151-300 यूनिट वाले स्लैब को समाप्त करने और रात के समय उच्च दाब उपभोक्ताओं को मिलने वाली रियायत  खत्म करने का भी विरोध किया गया है। इन सभी विसंगतियों पर विस्तृत चर्चा के लिए आयोग से व्यक्तिगत सुनवाई की मांग की है। ​विद्युत नियामक आयोग ने इस मामले में उपभोक्ताओं से आपत्तियां आमंत्रित की थीं। इस याचिका (क्रमांक 140/2025) पर आगामी 24 फरवरी 2026 को भौतिक सुनवाई  निर्धारित की गई है, जहाँ राजेंद्र अग्रवाल और अन्य हितधारक इन तथ्यों को विस्तार से आयोग के सामने रखेंगे। यदि विशेषज्ञों के इन सुझावों को माना जाता है, तो प्रदेश में बिजली महंगी होने के बजाय सस्ती हो सकती है।

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