शहपुरा के पारस वेयरहाउस की धांधली छिपाने अफसर पर 5 लाख रुपये लेने की लिखित शिकायत मगर जांच नहीं
जबलपुर। एक तरफ प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की बात कर रहे हैं, वहीं जबलपुर कलेक्ट्रेट में भ्रष्टाचार का खुला खेल चल रहा है। सहजपुर के पारस वेयरहाउस में मिली 9000 बोरियों की हेराफेरी और पुरानी धान को खपाने के खेल पर पर्दा डालने के लिए कथित तौर पर 5 लाख रुपये का लेन-देन हुआ है। शिकायतकर्ता ने साक्ष्यों के साथ कलेक्ट्रेट के वरिष्ठ अधिकारी की भूमिका पर सवाल उठाए हैं, लेकिन ताज्जुब है कि कलेक्टर को इस पूरे मामले की भनक तक नहीं है।
-क्या है वेयरहाउस और अफसर का कनेक्शन
ये मामला शहपुरा के सहजपुर स्थित पारस वेयरहाउस का है, जहाँ गंभीर अनियमितताएं पाए जाने के 20 दिन बीत जाने के बाद भी अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। हैरानी की बात यह है कि जांच रिपोर्ट तैयार होने के बावजूद कार्रवाई की फाइलें दफ्तरों के चक्कर काट रही हैं। एसडीएम व खाद्य अधिकारी की जांच में खुलासा हुआ है कि पारस वेयरहाउस में 'संस्कार महिला संगठन' के नाम पर धान की तुलाई का काम नियमों को ताक पर रखकर पुरुषों से कराया जा रहा था। इतना ही नहीं, करीब 9,000 बोरियों के रिकॉर्ड में हेरफेर पाया गया है। सबसे गंभीर आरोप यह है कि यहाँ खराब गुणवत्ता वाली पुरानी धान को नई खरीदी गई धान में मिलाकर स्टॉक किया जा रहा है। यह खेल इसलिए खेला जा रहा है ताकि लैब टेस्टिंग और गुणवत्ता जांच के दौरान पुरानी धान को नई बताकर खपाया जा सके और सरकारी खजाने को चूना लगाया जा सके। आरोप है कि 5 लाख लेने के बाद वेयरहाउस पर लगे गम्भीर आरोपों को सामान्य कर दिया गया है, इतना कि किसी कार्रवाई की गुंजाइश ही नहीं है।
-पूरा सिंडिकेट हुआ सक्रिय
शहपुरा, कुंडम, सिहोरा और कटंगी जैसे क्षेत्रों से भी इसी तरह की शिकायतें आ रही हैं, जिससे स्पष्ट है कि यह एक संगठित पैटर्न बन चुका है। प्रशासन की ओर से केवल नोटिस जारी कर खानापूर्ति की जा रही है। खाद्य आपूर्ति विभाग के अधिकारियों का कहना है कि नोटिस का जवाब मिल चुका है और जल्द निर्णय लिया जाएगा, लेकिन धरातल पर अब तक कोई सख्त कदम नहीं उठाया गया है। जैसे-जैसे धान उपार्जन की अंतिम तिथि नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे बिचौलियों और वेयरहाउस संचालकों की सक्रियता बढ़ गई है। अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इन दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करता है या फिर यह पूरा मामला ठंडे बस्ते में ही दबा रह जाता है।
सरकार की सख्ती भी नाकाफी
हैरानी की बात यह है कि राज्य सरकार और मुख्यमंत्री मोहन यादव की सख्ती और जांच रिपोर्ट तैयार होने के 20 दिन बाद भी विभाग केवल नोटिस का खेल खेल रहा है। शहपुरा, कुंडम और सिहोरा में सक्रिय यह सिंडिकेट सरकारी खजाने को चूना लगा रहा है, जबकि जिम्मेदार अधिकारी अब तक ठोस कार्रवाई करने में नाकाम रहे हैं। अधिकारियों की इस सुस्ती के पीछे रसूखदार वेयरहाउस संचालकों का राजनीतिक दबाव और विभागीय मिलीभगत एक बड़ी बाधा बनी हुई है। सूत्रों की मानें तो जांच रिपोर्ट में स्पष्ट प्रमाण होने के बावजूद, फाइलों को जानबूझकर तकनीकी उलझनों में फंसाया जा रहा है ताकि दोषियों को कानूनी दांव-पेंच से बचने का समय मिल सके। साथ ही, निचले स्तर के कर्मचारियों और बिचौलियों के बीच का गहरा तालमेल जमीनी स्तर पर कठोर कार्रवाई के आदेशों को ठंडे बस्ते में डालने के लिए प्रयासरत है, जिससे प्रशासन की साख पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
