हाईकोर्ट की फटकार: जबलपुर में सप्लाई हो रहा है ‘जहरीला’ पानी; नगर निगम पर 17.80 करोड़ का जुर्माना बरकरार


जबलपुर।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति और न्यायमूर्ति सराफ की युगलपीठ ने जबलपुर शहर में दूषित पानी की समस्या और सीवरेज प्रबंधन की बदहाली पर कड़ा रुख अपनाया है। शहरवासियों को मिल रहे 'जहरीले' पानी और ओमती नाले के प्रदूषित जल से उगाई जा रही सब्जियों के मामले में सुनवाई करते हुए न्यायालय ने नगर निगम सहित सभी संबंधित विभागों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। ​यह सुनवाई दो याचिकाओं पर एक साथ हुई। पहली, उच्च न्यायालय द्वारा लिया गया,जो ओमती नाले के गंदे पानी से सब्जियां उगाने की मीडिया रिपोर्ट पर आधारित था। दूसरी, डेमोक्रेटिक लॉयर्स फोरम द्वारा दायर याचिका, जिसमें इंदौर जैसी जलजनित त्रासदियों की आशंका जताते हुए जबलपुर की बदहाल पाइपलाइनों का मुद्दा उठाया गया था।

कोर्ट ने सिस्टम की गंभीर टिप्पणियां

 पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड  की रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने कहा कि पानी में 'टोटल कोलीफॉर्म' और 'फिजिकल कोलीफॉर्म' की मात्रा अत्यधिक है, जो मानवीय उपयोग के लिए बेहद खतरनाक और जानलेवा है। रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि जबलपुर में प्रतिदिन 174 लाख क्यूबिक मीटर सीवेज निकलता है, जबकि शहर के 12 प्लांट मिलकर केवल 75 लाख क्यूबिक मीटर पानी ही ट्रीट कर पाते हैं। शेष 99 लाख क्यूबिक मीटर गंदा पानी बिना उपचार के बहाया जा रहा है। शहर में 3 लाख घरों में सीवर कनेक्शन होने चाहिए, लेकिन वर्तमान में केवल 78,000 घरों को ही जोड़ा गया है। यानी शहर का 3/4 हिस्सा अभी भी सिस्टम से बाहर है, जिसके कारण गंदगी सीधे नालियों और पाइपलाइन के संपर्क में आ रही है।

नगर निगम पर 17.80 करोड़ का जुर्माना

​सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने पर्यावरण क्षति के एवज में नगर निगम पर 17.80 करोड़ रुपये का 'एनवायरमेंटल कंपनसेशन' लगाया था। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने बताया कि निगम ने अब तक यह राशि जमा नहीं की है। इस पर न्यायालय ने निगम को निर्देशित किया है कि उक्त राशि के भुगतान हेतु तत्काल कार्रवाई की जाए।डेमोक्रेटिक लॉयर्स फोरम की ओर से अधिवक्ता रवींद्र गुप्ता ने कोर्ट से गुहार लगाई कि नगर निगम स्वच्छ पानी की आपूर्ति में सक्षम सिद्ध नहीं हो रहा है। उन्होंने मांग की कि हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक 7 सदस्यीय मॉनिटरिंग कमेटी बनाई जाए, जिसमें कलेक्टर, कमिश्नर, पीएचई हेड और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हों। न्यायालय ने इस आवेदन को लंबित रखते हुए अगली सुनवाई पर विचार करने की बात कही है। मामले में डेमोक्रेटिक लॉयर्स फोरम की ओर से अधिवक्ता रवींद्र कुमार गुप्ता, पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की ओर से सिद्धार्थ सेठ और सुओ मोटो मामले में आर.एस. ठाकुर उपस्थित हुए। शासन का पक्ष अतिरिक्त महाधिवक्ता द्वारा रखा गया।

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