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फॉलोअप-ट्रांसको के अफसरों पर सवाल: ड्राइवर के वैरिफिकेशन की लंबी प्रोसेस, 226 करोड़ के टेंडर के दस्तावेज नहीं जांचे!

 


फर्जी परफॉर्मेंस सर्टिफिकेट से मिला ठेका, ईओडब्ल्यू ने देवबिल्ड इंडिया के तीन संचालकों पर केस दर्ज किया

जबलपुर। मध्यप्रदेश पावर ट्रांसमिशन कंपनी (ट्रांसको) में उजागर हुए 226 करोड़ रुपये के टेंडर घोटाले ने विभागीय पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हैरानी की बात यह है कि जहां ट्रांसको में सामान्य ड्राइवर की नियुक्ति के लिए भी महीनों तक वैरिफिकेशन और दस्तावेज जांच की प्रक्रिया चलती है, वहीं 226 करोड़ रुपये के हाईटेंशन प्रोजेक्ट का ठेका देने से पहले अनुभव के दस्तावेज की सत्यता की जांच नहीं की गई।कूटरचित परफॉर्मेंस सर्टिफिकेट के आधार पर टेंडर हासिल करने वाली कैलाश देवबिल्ड इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ आर्थिक अपराध ब्यूरो  ने प्रकरण दर्ज कर कंपनी में हड़कंप मचा दिया है।

-ऐसे हासिल किया 220 केवी सब स्टेशन का ठेका

 जांच में सामने आया कि कंपनी के प्रबंध संचालक कैलाश कुमार शुक्ला, निदेशक सीमा शुक्ला और भानू शुक्ला,तीनों निवासी 818 हाथीताल कॉलोनी, जबलपुर, ने 220 केवी सब स्टेशनों के निर्माण के लिए लगने वाले टेंडर में इनॉक्सविंड इंफ्रास्ट्रक्चर सर्विस लिमिटेड, नोएडा का 2 मार्च 2017 का जाली परफॉर्मेंस सर्टिफिकेट लगाया। टेंडर की पात्रता के अनुसार पूर्व में किए गए समान कार्यों का प्रमाण अनिवार्य था। आरोपियों ने कूटरचित दस्तावेज लगाकर न केवल पात्रता दिखाई, बल्कि पावर ट्रांसमिशन कंपनी शक्ति भवन, जबलपुर से हाईटेंशन लाइनों एवं सबस्टेशनों के निर्माण का बड़ा ठेका भी हासिल कर लिया। यह भी सामने आया कि कंपनी पहले भी कई तकनीकी परियोजनाओं में शामिल रही है, लेकिन दस्तावेज जांच की प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही बरती गई।

-अब अन्य ठेके भी जांच के घेरे में

ईओडब्ल्यू ने जब सर्टिफिकेट की सत्यता की जांच इनॉक्सविंड के नोएडा कॉर्पोरेट ऑफिस से कराई तो कंपनी ने स्पष्ट कहा कि ऐसा कोई प्रमाणपत्र उन्होंने जारी नहीं किया। इस पुष्टि के बाद ईओडब्ल्यू ने तीनों संचालकों के विरुद्ध अपराध क्रमांक 156/2025 दर्ज किया है। उन पर धारा 34, 420, 465, 468, 471 और 120-बी के तहत धोखाधड़ी, जालसाजी, फर्जी दस्तावेज का उपयोग और आपराधिक साजिश के आरोप लगाए गए हैं। जांच अधिकारी अब कंपनी के अन्य टेंडर, परियोजनाओं और प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों को भी खंगाल रहे हैं। संदेह है कि ट्रांसको के भीतर कुछ अधिकारियों की मिलीभगत या लापरवाही के कारण इतनी बड़ी वित्तीय अनियमितता संभव हो सकी। सूत्रों का कहना है कि आने वाले दिनों में जांच और बड़े खुलासे कर सकती है, और कुछ वरिष्ठ अधिकारी भी राडार पर आ सकते हैं।

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