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अधूरी याचिकाएँ अदालत का समय बर्बाद करती हैं, मुकदमे का ड्राफ्ट सिखाना कोर्ट का काम नहीं


आधे-अधूरे आवेदन पर हाईकोर्ट की सख्ती

जबलपुर। एक मामले की सुनवाई के दौरान मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने अधूरे और अस्पष्ट आवेदन पर कड़ी नाराज़गी जताई। न्यायमूर्ति विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की डिवीजन पीठ ने कहा कि अदालत इस बात के लिए नहीं बैठी कि वकीलों को यह सिखाए कि मुकदमे का आवेदन कैसे तैयार किया जाए। कोर्ट ने याचिकाकर्ता और उसके वकील को फटकार लगाते हुए कहा कि आवेदन प्रस्तुत करते समय पूरी सतर्कता बरतना आवश्यक है। मामला मुंबई की टॉपवर्थ टोलवेज़ (बेला) प्रा. लि. से जुड़ा था, जिसने आरोप लगाया था कि टोल प्लाजा पर अवैध वसूली रोकने के लिए पुलिस में दी गई शिकायत और उनके द्वारा लगाई गई रोक को लेकर कंपनी के मूल दस्तावेज पुलिस द्वारा जब्त कर लिए गए थे। कंपनी का कहना था कि पुलिस ने दर्ज रिपोर्ट के बाद 26 जून 2025 को फोटो कॉपी पेश करने की अनुमति दी थी, जिसके आधार पर वह हाईकोर्ट पहुँची। सुनवाई में पाया गया कि कंपनी का आवेदन न तो दस्तावेजों के विस्तृत विवरण से युक्त था और न ही यह बताया गया था कि पेश किए गए दस्तावेज किसके द्वारा तैयार किए गए थे। पीठ ने कहा कि ऐसे आधे-अधूरे आवेदन न्यायिक प्रक्रिया को बाधित करते हैं। अदालत ने दो टूक कहा कि वह आवेदन लिखना सिखाने के लिए नहीं बैठी है।इसी टिप्पणी के साथ कोर्ट ने याचिका को हस्तक्षेप योग्य न मानते हुए खारिज कर दिया।





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