मौखिक बयान संदिग्ध, हत्या के तीन आरोपी बरी

 


बिना प्रमाण वैध नहीं है मृत्यु-पूर्व मौखिक बयान:हाई कोर्ट 

जबलपुर। मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि बिना पुष्टिकारक साक्ष्य के दी गई मृत्यु-पूर्व मौखिक घोषणा  कानून की दृष्टि में स्वीकार्य नहीं है। मृत्युकालिक कथन की पुष्टि न होने और परिस्थितिजन्य साक्ष्य श्रृंखला पूरी न होने के आधार पर कोर्ट ने हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा पाए तीन आरोपितों को दोषमुक्त कर दिया। न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल तथा न्यायमूर्ति अवनींद्र कुमार सिंह की पीठ ने पाया कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य न तो प्रत्यक्षदर्शी गवाही से पुष्ट होते हैं और न ही परिस्थितिजन्य साक्ष्य एक सम्पूर्ण कड़ी का निर्माण करते हैं। ऐसे में दोषसिद्धि को बरकरार रखना उचित नहीं है।

-क्या है ये मामला

ग्राम ताखुली, जिला अनूपपुर निवासी पिंकी यादव, उसके पति रमाकांत यादव और देवर मिंटू उर्फ घनश्याम को जिला न्यायालय ने हत्या का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। तीनों ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। अधिवक्ता ब्रम्हेंद्र पाठक ने तर्क दिया कि घायल देवेन्द्र जायसवाल ने प्रारंभ में बताया था कि उस पर लूट के उद्देश्य से पाँच अज्ञात व्यक्तियों ने हमला किया था। घटना 30 मई 2019 की रात हुई थी। घायल को उपचार के लिए जबलपुर लाया गया और 14 जून को उसकी मृत्यु हो गई। एफआईआर घटना के पाँच दिन बाद 4 जून को अज्ञात आरोपितों के विरुद्ध दर्ज की गई थी। बाद में मृतक के भांजे ने बयान दिया कि देवेन्द्र ने उसे नामजद व्यक्तियों के बारे में बताया था, जिसके आधार पर जिला न्यायालय ने तीनों आरोपितों को सजा सुनाई थी।

-अभियोजन के गवाहों के बयानों में विरोधाभाष:कोर्ट 

हाई कोर्ट ने कहा कि अभियोजन गवाहों के बयानों में महत्वपूर्ण विरोधाभास हैं।एफआईआर और धारा 161 के शुरुआती बयानों में आरोपितों के नाम नहीं थे। कथित मौखिक मृत्यु-पूर्व घोषणा प्रमाणित नहीं, इसलिए स्वीकार्य नहीं व परिस्थितिजन्य साक्ष्य की श्रृंखला अधूरी है। इन तथ्यों को आधार मानते हुए हाई कोर्ट ने जिला न्यायालय का निर्णय निरस्त कर तीनों आरोपितों को बरी कर दिया।





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