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बिजली सब्सिडी: 80 फीसदी को राहत, 20 के लिए बड़ी आफत



पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी ने किया खुलासा, नीति निर्धारक भी कटघरे में, वोट बैंक की राजनीति से बिगड़ा विद्युत वितरण का संतुलन

जबलपुर। मप्र पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी द्वारा अपने खास उपभोक्ताओं को सब्सिडी देने का खेल अब खतरे के निशान के पास पहुंच गया है। कम आय वाले ग्राहकों के घरों में सस्ती दरों में उजाला करने की सरकार की कोशिश उन उपभोक्ताओं के जेब पर डाका डाल रही है,जो बिना सब्सिडी के पूरे बिल का भुगतान कर रहे हैं। कंपनी ने हाल ही सितंबर महीने के आंकड़े जारी किए हैं,जिसके आंकड़े नीति निर्धारण करने वालों के लिए आंखें खोलने वाले हैं। इस रिपोर्ट पर कंपनी मुख्यालय के आला अधिकारी बात नहीं करना चाहते और अधिकांश अफसर इस रिपोर्ट से ही अंजान बने हुए हैं।

-बिल की वसूली में दिख रही विसंगति

मध्यप्रदेश पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी  कंपनी द्वारा सितंबर 2025 के जारी आंकड़ों के मुताबिक, 50.8 लाख कुल उपभोक्ताओं में से 40.8 लाख (80 प्रतिशत) उपभोक्ताओं को 1 हजार 8 सौ 95 करोड़ की सब्सिडी दी गई, जबकि केवल 10 लाख उपभोक्ताओं (करीब 19.85 प्रतिशत) से 1 हजार 9 करोड़ की वसूली की गयी। कंपनी द्वारा खुद जारी किए गये इन आंकड़े ये सिद्ध करने के लिए काफी हैं कि सिर्फ कागजों में ही सब कुछ ठीक चल रहा है,असल में विसंगति बहुत गंभीर हो चुकी है। सब्सिडी का उद्देश्य भले ही कम आय वाले परिवारों को राहत देना हो, लेकिन इसका सीधा असर बाकी उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है। बिजली दरों में बढ़ोत्तरी और वित्तीय असंतुलन जैसी स्थितियां इन्हीं नीतियों का नतीजा हैं।

-सब्सिडी का आधार आर्थिक हो

सब्सिडी का लाभ उन्हें मिल रहा है जो महीने में 150 यूनिट तक बिजली का उपयोग करते हैं। लेकिन जो उपभोक्ता इससे अधिक खपत करते हैं या व्यावसायिक उपयोग में बिजली लेते हैं, वे केवल अपने उपयोग का ही नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम में सब्सिडी के कारण होने वाले घाटे की भी भरपाई कर रहे हैं। गैर-सब्सिडी उपभोक्ताओं के लिए बिजली की दरें लगातार बढ़ रही हैं। ये उपभोक्ता बिजली खरीद, ग्रिड रखरखाव और अन्य व्यवस्थागत खर्चों का पूरा बोझ उठा रहे हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि उन्हें अपनी हैसियत से अधिक भुगतान करना पड़ रहा है, वो भी सिस्टम की खामियों के कारण नहीं, बल्कि नीतिगत असंतुलन की वजह से। विद्युत वितरण से जुड़े जानकारों का कहना है कि अब समय आ गया है जब सरकार और विभाग को सब्सिडी व्यवस्था की समीक्षा करनी चाहिए। केवल यूनिट-आधारित नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिति पर आधारित सब्सिडी दी जानी चाहिए, ताकि जरूरतमंदों को लाभ मिले और अन्य उपभोक्ताओं पर अनावश्यक भार न बढ़े।

-सब्सिडी के कारण ही बढ़ रहा टैरिफ

जानकारों की मानें कि यदि बिजली टैरिफ से सब्सिडी को समाप्त कर दिया जाए तो बिजली की दरों में बढ़ोत्तरी इतनी तेजी से नहीं होगी,जितनी तेजी से हो रही है। नई दरें तैयार करते वक्त कंपनी सब्सिडी में खर्च होने वाली राशि से पैदा होने वाली आर्थिक स्थितियों का भी बराबर ध्यान रखती है और उसी हिसाब से बिजली के दाम तय किए जाते हैं। हालाकि, सरकार सब्सिडी की राशि कंपनी को भुगतान करती है,लेकिन इस अंतराल में कंपनी को अपने खर्च पूरे करने के लिए धन की आवश्यकता होती है। कंपनी के खर्च पूरे करने के लिए उन उपभोक्ताओं को बढ़ा हुआ टैरिफ बर्दाश्त करना पड़ता है,जो सब्सिडी के दायरे में नहीं आती। 

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