जबलपुर। धान की फसल के लिए यूरिया और पोटाश की प्रचुर उपलब्धता के शासकीय दावों के बीच मध्य प्रदेश राज्य विपणन संघ कृषि भूमि के आधार पर खाद का वितरण कर रहा है। तय नियमों के तहत 1 हेक्टेयर यानी ढाई एकड़ भूमि पर पूरे सीजन में केवल 3 से 4 बोरी यूरिया दिया जा रहा है, जबकि रोपाई से अंतिम छिड़काव तक किसान को प्रति हेक्टेयर लगभग 6 बोरी यूरिया की दरकार होती है। सहकारी समितियां रजिस्टर में इंद्राज दर्ज करके ही रासायनिक खाद बांट रही हैं। जरूरत से कम कोटा मिलने के कारण किसान खुले बाजार में निजी विक्रेताओं से महंगे दामों पर खाद खरीदने को विवश हैं। सिहोरा, मझौली, पाटन, पनागर, शहपुरा भिटौनी, बरेला और मझगवां के केंद्रों पर अन्नदाताओं की भारी कतारें लग रही हैं।
सोसायटियों में खाद संकट से कालाबाजारी का बढ़ा नेटवर्क
जिले के बड़े किसान रोपाई के बाद बेहतर पैदावार की उम्मीद में डीएपी और यूरिया का मिक्स डोज खेतों में डाल रहे हैं। तय सरकारी कोटे और वास्तविक जरूरत के अंतर ने खाद माफिया की सक्रियता बढ़ा दी है। ग्रामीण और शहरी इलाकों में बिचौलिए किसानों की विवशता का फायदा उठाकर मनमाने दाम वसूल रहे हैं। अन्नदाताओं की मांग है कि सोसायटियों से परमिट के अलावा नकद भुगतान पर भी पर्याप्त मात्रा में खाद उपलब्ध कराई जाए, ताकि उन्हें निजी दुकानों के चक्कर न काटने पड़ें।
सरकारी वितरण प्रणाली पर निजी सेक्टर पड़ रहा भारी
डीएपी, ग्रोमोर और यूरिया के उत्पादन व आयात का 75 से 80 प्रतिशत वितरण केंद्र व राज्य सरकार के पास रहता है, जिसे विपणन सहकारी समिति और डबल लॉक केंद्रों के माध्यम से भेजा जाता है। इसके विपरीत निजी कंपनियों के पास कुल उत्पादन का मात्र 20 प्रतिशत हिस्सा होने के बावजूद उनकी दुकानों पर कभी स्टॉक की कमी नहीं दिखती। सरकारी वितरण तंत्र 80 प्रतिशत हिस्सेदारी संभालकर भी किसानों की मांग पूरी नहीं कर पा रहा, जबकि 20 प्रतिशत वाले निजी डीलर भरपूर आपूर्ति कर भारी मुनाफा कमा रहे हैं।
