श्रमजीवी पत्रकार परिषद के अधिवेशन में वरिष्ठ साहित्यकार राजेंद्र तिवारी की दो कृतियाँ लोकार्पित, जबलपुर की बौद्धिक थाती को मिला नया मान
जबलपुर। शहर के कचनार सिटी में संपन्न राष्ट्रीय पत्रकार परिषद के राष्ट्रीय अधिवेशन में शहर के स्वर्गीय वरिष्ठ पत्रकार एवं ख्यातिनाम साहित्यकार स्वर्गीय राजेंद्र तिवारी 'प्रज्ञेय' की दो कृतियों का गरिमामय लोकार्पण संपन्न हुआ। समारोह में मध्य प्रदेश शासन के लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह, पूर्व मंत्री रामकृष्ण कुसमरिया, विधायक अभिलाष पांडे तथा जेडीए अध्यक्ष संदीप जैन मंचासीन रहे। इनके साथ ही वरिष्ठ पत्रकार गंगा पाठक, श्रमजीवी पत्रकार परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष परमानंद तिवारी और वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश तिवारी सहित बड़ी संख्या में पत्रकार व साहित्य जगत के प्रतिनिधि मौजूद थे। इस भव्य मंच से 'प्रज्ञेय जी' के बहुप्रतीक्षित काव्य संग्रह 'तलाश' और दोहा संग्रह 'लौट आया कबीर' को सार्वजनिक पठन के लिए जारी किया गया। उपस्थित जनसमूह ने उनके साहित्यिक व पत्रकारिता अवदान को शिद्दत से याद किया।
जनसरोकार से उपजी तलाश और कबीर की वाणी
विमोचित काव्य संग्रह 'तलाश' में अंतर्मन की खोज और समकालीन परिवेश की विषमताओं का यथार्थवादी चित्रण मिलता है। वहीं दूसरा संकलन 'लौट आया कबीर' पारंपरिक दोहा छंद के माध्यम से आज के समय में नैतिक मूल्यों, ढोंग और विसंगतियों पर कड़ा प्रहार करता है। दोनों ही ग्रंथ अपनी वैचारिक स्पष्टता, शिल्प विधान और जनभाषा के सहज प्रवाह के चलते पाठकों को सीधे तौर पर प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।
आम जनमानस की पीड़ा बनी रचनाओं का आधार
दिवंगत प्रज्ञेय जी ने अपनी पूरी जीवन यात्रा के दौरान आम आदमी की रोजमर्रा की समस्याओं, संघर्षों और अभावों को अपनी लेखनी का केंद्रीय विषय बनाया। उनकी रचनाएं किसी काल्पनिक जगत की सैर कराने के बजाय सीधे खेत-खलिहान, दफ्तर और आम सड़कों पर खड़े व्यक्ति के दुख-दर्द को अभिव्यक्ति देती हैं। उनके छंदों और पंक्तियों में व्यवस्था के सताए हुए नागरिक की वास्तविक चीख और बदलाव की सकारात्मक उम्मीद दोनों एक साथ सुनाई देती हैं।
पत्रकारिता और साहित्य जगत में छोड़ी अमिट छाप
जबलपुर की उर्वर धरा को बौद्धिक पहचान दिलाने में उनका योगदान हमेशा अविस्मरणीय माना जाएगा। उन्होंने अपनी पैनी पत्रकारिता से सत्य को उजागर किया और साथ ही सृजनात्मक लेखन से मानवीय संवेदनाओं को नया धरातल प्रदान किया। सादगीपूर्ण जीवन जीते हुए उन्होंने शब्दों को केवल सूचना का जरिया नहीं बल्कि समाज सुधार का सशक्त माध्यम बनाया, जिसकी गूंज आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को निरंतर प्रेरित करती रहेगी।
