जबलपुर। नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के अध्यक्ष डॉ. पीजी नाजपांडे के नेतृत्व में आज टाउन हॉल परिसर स्थित गांधी जी के पुतले के सामने विभिन्न जन संगठनों के प्रतिनिधियों ने एकत्रित होकर मौन प्रदर्शन किया तथा प्रार्थना की कि गांधी जी अब जबलपुर को बचाएं। डॉ. पी.जी. नाजपांडे ने कहा कि विधानसभा द्वारा पारित प्रस्ताव में उज्जैन को 6 संभाग तथा 31 जिले दिए गए हैं जबकि जबलपुर को केवल 4 संभाग एवं 24 जिले दिए गए हैं। क्षेत्रफल और जनसंख्या की दृष्टि से उज्जैन से बड़ा शहर होने के बावजूद जबलपुर के साथ यह भेदभावपूर्ण विभाजन किया गया है जिस पर सत्तापक्ष के जनप्रतिनिधियों ने पूर्णतः चुप्पी साधी है। इस अवसर पर रजत भार्गव, टी.के. राजघटक, एड. वेदप्रकाश अधौलिया, सुभाष चंद्रा, सुशीला कन्नौजिया, गीता पाण्डे, डी.के. सिंह, संतोष श्रीवास्तव, पी.एस.राजपूत, माया कुशवाहा, यशवंत कोष्टा, वी.एन. कमलाकर, के.सी. सोनी, उमा दाहिया, पूर्णिमा नायडू, एड.बृजेश साहू, श्याम सोलंकी, कंचन पटेल, अशोक यादव, अनिल गुप्ता और राममिलन शर्मा सहित अनेक लोग उपस्थित थे।
संभाग और जिलों के बंटवारे में हुआ बड़ा अन्याय
मंच ने आरोप लगाया कि मेडीकल यूनिवर्सिटी का यह विभाजन पूरी तरह से मनमानी और पक्षपातपूर्ण तरीके से किया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि विधानसभा द्वारा पारित इस प्रस्ताव को अब मंजूरी हेतु महामहिम राज्यपाल के पास भेजा गया है। उन्होंने कहा कि जबलपुर की अस्मिता और साख को बचाने के लिए जन संगठनों ने एकमत होकर यह प्रस्ताव पारित किया है कि राज्यपाल इस प्रस्ताव को अपनी मंजूरी बिल्कुल भी न दें। क्षेत्रफल और जनसंख्या के सभी पैमानों को दरकिनार करके जबलपुर के अधिकार क्षेत्र को कम किया गया है जिससे स्थानीय नागरिकों में भारी आक्रोश व्याप्त है। सत्ताधारी दल के जनप्रतिनिधियों का इस गंभीर मुद्दे पर मौन रहना शहर के साथ बहुत बड़ा छलावा साबित हो रहा है।
राज्यपाल से प्रस्ताव अस्वीकार करने की अपील
जन संगठनों ने स्पष्ट रूप से चेतावनी दी है कि यदि इस पक्षपातपूर्ण प्रस्ताव पर रोक नहीं लगाई गई तो आंदोलन को और अधिक तीव्र किया जाएगा। बैठक में शामिल सभी प्रमुख नागरिकों ने एक स्वर में कहा कि जबलपुर की ऐतिहासिक पहचान और उसके हकों की रक्षा के लिए जनता सड़क से लेकर न्यायालय तक संघर्ष करने के लिए पूरी तरह तैयार है। इस पूरे घटनाक्रम के बाद प्रशासनिक हलकों में भी सरगर्मी तेज हो गई है तथा आम जनता के बीच इस बात की चर्चा जोरों पर है कि क्या राज्यपाल इस मनमाने प्रस्ताव पर कोई सकारात्मक हस्तक्षेप करेंगे या नहीं।
