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इमरजेंसी: भारतीय लोकतंत्र के माथे पर लगा गहरा कलंक

 




जबलपुर। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रभारी डॉ. महेंद्र सिंह ने गुरुवार को जबलपुर के कलचरल स्ट्रीट सभागार में संविधान हत्या दिवस पर आयोजित संगोष्ठी में भाग लिया। इस कार्यक्रम में उन्होंने आपातकाल के दौरान संघर्ष करने वाले लोकतंत्र सेनानियों और मीसाबंदियों को शाल, श्रीफल एवं स्मृति-चिह्न भेंटकर सम्मानित किया। इसके साथ ही उन्होंने आपातकाल की विभीषिका पर आधारित एक चित्र प्रदर्शनी का उद्घाटन किया और साइंस कॉलेज परिसर में एक पेड़ मां के नाम अभियान के तहत पौधारोपण किया। इस अवसर पर सांसद आशीष दुबे, विधायक अशोक रोहाणी, जिला अध्यक्ष रत्नेश सोनकर, लोकतंत्र सेनानी संघ के जिला अध्यक्ष अंजनी सिंह, राज्यसभा सांसद सुमित्रा वाल्मीकि, ग्रामीण जिला अध्यक्ष राजकुमार पटेल, प्रदेश कोषाध्यक्ष अखिलेश जैन, महिला मोर्चा प्रदेश अध्यक्ष अश्विनी परांजपे, जिला प्रभारी आलोक संजर, जेडीए अध्यक्ष संदीप जैन, उपाध्यक्ष प्रशांत केसरवानी, नगर निगम उपाध्यक्ष रिंकू विज, निःशक्तजन प्रकोष्ठ के प्रदेश संयोजक संदीप रजक, दीपांकर बनर्जी, डॉ. स्वाति गोडबोले, पूर्व मंत्री शरद जैन, मोती कश्यप, प्रदेश मीडिया सह प्रभारी श्रीकान्त साहू, प्रदेश प्रवक्ता डॉ. वाणी अहलूवालिया, जिला महामंत्री पंकज दुबे, रंजीत पटेल और अमित बचवानी सोनू सहित कई कार्यकर्ता उपस्थित थे। अपने प्रवास के दौरान उन्होंने वरिष्ठ नेत्री पूर्व सांसद जयश्री बैनर्जी और विधायक अशोक रोहाणी के निवास पर जाकर शिष्टाचार भेंट भी की।

​कुर्सी बचाने के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या हुई

​स्वतंत्रता के बाद देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित हुई थी, लेकिन नेहरू-गांधी परिवार ने सत्ता पर अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों को कुचल दिया। इसी मानसिकता के चलते 25 जून 1975 को देश पर आपातकाल थोपा गया, जो भारतीय लोकतंत्र पर सबसे बड़ा हमला था। उस समय देश में न तो कोई युद्ध की स्थिति थी और न ही कोई आंतरिक संकट था। वास्तव में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित किए जाने के बाद जब सत्ता हाथ से निकलती दिखाई दी, तब यह तानाशाही निर्णय लिया गया।

​जेलों की काल कोठरी में सिसकती रही आजादी

​तत्कालीन प्रधानमंत्री ने जनभावनाओं का सम्मान किए बिना रात के समय आपातकाल लागू कर दिया। इसके बाद राजनीतिक कार्यकर्ताओं, सामाजिक संगठनों के सदस्यों और पत्रकारों को बर्बरतापूर्वक प्रताड़ित किया गया। प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई, अखबारों की बिजली काट दी गई और विदेशी पत्रकारों को प्रतिबंधित कर दिया गया। जेलों में क्षमता से 4 गुना अधिक लोगों को ठूंस दिया गया। लगभग 19 महीनों तक देशभर में 100000 से अधिक लोग जेलों में बंद रहे, जिन्हें अंग्रेजों के शासनकाल से भी अधिक अमानवीय यातनाएं झेलनी पड़ीं। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस समय भूमिगत रहकर गांव-गांव तक सच्चाई पहुंचा रहे थे और पीड़ित परिवारों की सहायता कर रहे थे। शाह आयोग की रिपोर्ट में भी यह साफ कहा गया था कि आपातकाल लगाने की कोई संवैधानिक जरूरत नहीं थी। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और जॉर्ज फर्नांडिस सहित हजारों नेताओं के त्याग से ही देश में लोकतंत्र की पुनर्स्थापना हो सकी। वर्ष 2014 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में संविधान की मर्यादा और लोकतांत्रिक संस्थाओं को निरंतर मजबूत किया जा रहा है।



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