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मेडिकल यूनिवर्सिटी का बंटवारा तय, जबलपुर के हिस्से आएंगे सिर्फ 14 जिले



महाकौशल के कद को छोटा करने की प्रशासनिक साजिश, नेताओं की चुप्पी पर उठे सवाल,​तीन टुकड़ों में बंटेगी मध्य प्रदेश की इकलौती मेडिकल यूनिवर्सिटी, बढ़ेगा भारी खर्च

जबलपुर। संस्कारधानी जबलपुर की अस्मिता पर एक बार फिर बड़ा प्रहार होने जा रहा है, जिसे यहां के राजनीतिक कर्णधारों और नीति-निर्धारकों की एक बड़ी रणनीतिक चूक के रूप में देखा जा रहा है। मध्य प्रदेश की एकमात्र आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय को तीन हिस्सों में बांटने की सरकारी तैयारी ने महाकौशल की प्रतिष्ठा को दांव पर लगा दिया है। इस विभाजन से जबलपुर का कद लगातार घटता जाएगा, जो स्थानीय नेतृत्व की घोर उदासीनता को दर्शाता है। जबलपुर, भोपाल और उज्जैन में अलग-अलग मेडिकल यूनिवर्सिटी बनाने के इस नए प्रस्ताव से सरकार पर हर साल लगभग 120 करोड़ रुपए का भारी वित्तीय बोझ बढ़ेगा। इस प्रशासनिक अनदेखी को नजरअंदाज करना जबलपुर के भविष्य के लिए बहुत महंगा साबित होने वाला है, क्योंकि इससे इस ऐतिहासिक शहर का राज्य स्तरीय दबदबा पूरी तरह खत्म हो जाएगा।

महाकौशल के गौरव और प्रशासनिक प्रभाव को सीमित करने की प्रशासनिक तैयारी

इस विभाजनकारी योजना के लागू होने के बाद जबलपुर मेडिकल यूनिवर्सिटी का भौगोलिक और प्रशासनिक दायरा बेहद सीमित हो जाएगा। अब इसके अधिकार क्षेत्र में केवल 14 जिले ही शेष रह जाएंगे। इनमें रीवा, सतना, सिंगरौली, शहडोल, छिंदवाड़ा, सिवनी, मंडला, बालाघाट, उमरिया, डिंडोरी, सीधी, पन्ना और टीकमगढ़ शामिल हैं। दूसरी ओर, भोपाल और उज्जैन की नई प्रस्तावित यूनिवर्सिटी को 18-18 जिलों का बड़ा और समृद्ध कार्यक्षेत्र सौंपने की तैयारी की जा रही है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि जबलपुर के नेताओं ने इस समय अपनी आवाज बुलंद नहीं की, तो विकास की दौड़ में यह शहर अपने पड़ोसी संभागों से बहुत पीछे छूट जाएगा और इसकी पहचान केवल एक क्षेत्रीय केंद्र तक सिमट जाएगी।

राजस्व और व्यय के असंतुलन से बढ़ेगा सरकार पर भारी आर्थिक संकट

आर्थिक मोर्चे पर भी यह निर्णय पूरी तरह तर्कहीन नजर आता है। वर्तमान में संचालित अकेली मेडिकल यूनिवर्सिटी विभिन्न संबद्धता शुल्क, परीक्षा फीस, नामांकन और प्रकाशन जैसे माध्यमों से हर साल लगभग 70 से 75 करोड़ रुपए की अच्छी-खासी आय कमा लेती है। इसके विपरीत, इसके सुचारू संचालन पर सालाना औसतन केवल 30 से 40 करोड़ रुपए ही खर्च होते हैं। लेकिन यदि तीन यूनिवर्सिटी का नया ढांचा जमीन पर उतरा, तो नए भवनों के निर्माण, प्रशासनिक अमले की नियुक्ति और अन्य व्यवस्थाओं के कारण यह खर्च बढ़कर सीधे 150 करोड़ रुपए सालाना तक पहुंच जाएगा। यानी वर्तमान व्यवस्था की तुलना में राज्य के खजाने पर भारी वित्तीय घाटे का बोझ लाद दिया जाएगा।

प्रशासनिक खोखलेपन और कार्यप्रणाली के टकराव से विद्यार्थियों की बढ़ेगी परेशानी

शिक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि जब वर्तमान विश्वविद्यालय में ही कर्मचारियों की भारी कमी है और कई महत्वपूर्ण पद प्रतिनियुक्ति के भरोसे चल रहे हैं, तब तीन नए स्वतंत्र संस्थानों को खड़ा करना एक बड़ी चुनौती होगी। शासन भले ही यह दावा कर रहा है कि क्षेत्रीय स्तर पर मेडिकल, डेंटल, आयुष, होम्योपैथी और पैरामेडिकल कॉलेजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए यह फैसला जरूरी है ताकि परीक्षा और परिणाम समय पर आ सकें। परंतु हकीकत यह है कि अलग-अलग यूनिवर्सिटी बनने से कार्यप्रणाली में अंतर आएगा और प्रशासनिक समन्वय कमजोर होगा। विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार यह प्रस्ताव अभी पूरी तरह विचाराधीन है, लेकिन शासन स्तर पर जारी इस तेज कवायद ने शिक्षा जगत में गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं।

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