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गेहूँ खरीदी का बंटाढार: स्व-सहायता समूहों को अब तक नहीं मिली अनुमति



जबलपुर।  जिले में महिला स्व-सहायता समूहों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के उद्देश्य से गेहूं खरीदी की जिम्मेदारी सौंपी जानी थी, लेकिन यह योजना प्रशासनिक लेटलतीफी की भेंट चढ़ गई है। आज से उपार्जन प्रक्रिया प्रारंभ होना तय था, इसके बावजूद जिला स्तर से समूहों के अनुमति पत्र महज 2 दिन पहले भोपाल भेजे गए। वर्तमान में केवल 8 स्वसहायता समूहों की अनुमति के लिए ही फाइल आगे बढ़ पाई है। नियमानुसार उपार्जन की शुरुआत से काफी पहले इन समूहों का चयन और प्रशिक्षण पूरा हो जाना चाहिए था, लेकिन सिस्टम तैयार न होने से केंद्रों के कामकाज पर अब प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

​केंद्रों की संख्या में भारी कटौती

​जिले में इस वर्ष समर्थन मूल्य पर गेहूं विक्रय करने वाले किसानों के आंकड़ों में बड़ी गिरावट आई है। पिछले सीजन में जहां 58 हजार किसानों ने पंजीयन कराया था, वहीं इस साल यह संख्या घटकर 50 हजार रह गई है। किसानों की संख्या कम होने के साथ ही खरीदी केंद्रों के निर्धारण में भी बड़ी कटौती की गई है। पूर्व में जिले में वेयर हाउस और खरीदी केंद्रों की कुल संख्या 75 के आसपास रहती थी, जिसे इस बार घटाकर मात्र 47 कर दिया गया है। केंद्रों की संख्या सीमित होने से उपार्जन के दौरान भीड़ बढ़ने और प्रबंधन बिगड़ने की आशंका जताई जा रही है।

​सर्वर डाउन से स्लॉट बुकिंग फेल

​प्रशासनिक दावों के विपरीत धरातल पर गेहूं खरीदी का डिजिटल तंत्र पूरी तरह विफल साबित हो रहा है। भारतीय किसान संघ के राष्ट्रीय प्रचार सचिव राघवेंद्र पटेल ने आरोप लगाया है कि खरीदी शुरू होते ही सर्वर डाउन रहने का बहाना बनाया जा रहा है। तकनीकी खामियों के कारण किसानों की स्लॉट बुकिंग नहीं हो पा रही है, जिससे वे अपनी उपज लेकर केंद्रों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। इस तकनीकी विफलता ने किसानों के सामने नई मुसीबत खड़ी कर दी है और वे अपनी बारी का इंतजार करने को मजबूर हैं।

​किसानों को एमएसपी से कम दाम पर बेचने की मजबूरी

​सरकारी सिस्टम में आई बाधाओं का सीधा लाभ बाजार के बिचौलिए और व्यापारी उठा रहे हैं। उपार्जन केंद्रों पर खरीदी शुरू न होने और स्लॉट बुकिंग फेल होने के कारण किसान अपनी उपज मंडी में व्यापारियों को बेचने पर विवश हैं। मजबूरी में किसान अपनी फसल को समर्थन मूल्य से काफी कम कीमत पर बेच रहे हैं। इस अव्यवस्था की वजह से किसानों को प्रति क्विंटल 400 से 500 रुपए का भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। पूरा प्रशासनिक तंत्र इस संकट के समय में मूकदर्शक बना हुआ है।

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