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बिना 'किताब' फीका हुआ प्रवेशोत्सव, अफसरों के दावों की पोल खुली


डीपीसी ऑफिस की लापरवाही बनी निराशा की वजह,उठ रहे हैं गम्भीर सवाल

जबलपुर। जिले के सरकारी स्कूलों में 1 अप्रैल से नए शैक्षणिक सत्र का आगाज हो गया है। सरकार की मंशा के अनुरूप इस दिन को प्रवेश उत्सव के रूप में मनाया जाना था ताकि बच्चे पहले ही दिन हाथ में नई किताबें लेकर उत्साह के साथ शिक्षा की शुरुआत कर सकें। हकीकत इसके ठीक उलट नजर आ रही है। जिले के अधिकांश स्कूलों में बच्चे बिना किताबों के ही स्कूल पहुंचने को मजबूर हुए हैं। शिक्षा विभाग के जिला परियोजना समन्वयक कार्यालय की लापरवाही ने सरकार के इस महत्वाकांक्षी अभियान की हवा निकाल दी है। जमीनी स्तर पर पड़ताल करने पर यह साफ हो गया है कि किताबों के वितरण की जो व्यवस्था कागजों पर दिखाई गई थी वह धरातल पर पूरी तरह विफल साबित हुई है। छात्र स्कूल तो पहुंचे लेकिन उन्हें नई पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध नहीं हो सकीं।

-​डीपीसी ऑफिस ने नहीं दिया ध्यान

​जिला परियोजना समन्वयक योगेश शर्मा ने सत्र शुरू होने से पहले बड़े-बड़े दावे किए थे कि सभी स्कूलों में समय पर किताबें पहुंचा दी जाएंगी। 1 अप्रैल की सुबह इन दावों की असलियत सबके सामने आ गई। विभाग के भीतर बैठे अधिकारियों और कर्मचारियों की कार्यप्रणाली ने पूरे जिले में व्यवस्था को ठप कर दिया है। श्री शर्मा के नेतृत्व वाले इस कार्यालय ने अब तक किताबों को संबंधित संकुलों और स्कूलों तक भेजने की जहमत नहीं उठाई। विभागीय तालमेल की कमी और प्रशासनिक ढिलाई के कारण आज जिले भर के हजारों छात्रों के चेहरे पर निराशा दिखाई दी। प्रवेश उत्सव महज एक औपचारिकता बनकर रह गया है, क्योंकि बिना शिक्षण सामग्री के इस उत्सव का कोई औचित्य नजर नहीं आ रहा है।

-​किराए के खेल ने बिगाड़ा बच्चों का उत्साह

​किताबों के वितरण को लेकर विभाग में एक अजीब तरह का पेंच फंसा हुआ है। शासन के स्पष्ट निर्देश हैं कि विभाग को स्वयं स्कूलों तक किताबें पहुंचानी हैं। इसके विपरीत जिला परियोजना समन्वयक कार्यालय के अधिकारी यह चाहते हैं कि स्कूलों के शिक्षक या प्राचार्य खुद कार्यालय आकर किताबों का उठाव करें। इस खींचतान के बीच पिसना छात्रों को पड़ रहा है। अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए तर्क दे रहे हैं कि स्कूल प्रबंधन खुद किताबें ले जाता है और इसके बदले उन्हें किराया दिया जाता है। विभाग का यह तर्क पूरी तरह खोखला साबित हो रहा है क्योंकि किसी भी स्कूल को अब तक न तो परिवहन बिल पेश करने का मौका मिला है और न ही किसी को किराए का भुगतान किया गया है। अब जांच का विषय है कि आखिर किराए की राशि कहाँ जा रही है।

-​शिक्षा विभाग की उदासीनता से योजना विफल

​प्रवेश उत्सव की असफलता के पीछे पूरी तरह से विभागीय अधिकारियों की उदासीनता जिम्मेदार है। सरकार ने बजट और संसाधन मुहैया कराए हैं ताकि सत्र के पहले दिन ही शिक्षण कार्य सुचारू रूप से शुरू हो सके। जबलपुर जिले में डीपीसी कार्यालय की जिद और गलत नीतियों के कारण यह योजना पटरी से उतर गई है। सूत्रों की मानें तो किताबों के परिवहन के नाम पर होने वाले खर्चों में पारदर्शिता की कमी है। इसी वजह से अधिकारी किताबों को स्कूलों तक पहुंचाने की जगह शिक्षकों पर दबाव बना रहे हैं। बिना किताबों के शुरू हुए इस सत्र ने शिक्षा विभाग की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं। अब देखना यह है कि उच्च स्तर पर इन लापरवाह अधिकारियों के विरुद्ध क्या कार्रवाई की जाती है।

किताबें पहुंचाई जा रहीं

ग्रामीण इलाके के स्कूलों में किताबें नहीं पहुंची हैं, लेकिन शहर में किताबें पहुंचाई जा चुकी हैं। स्कूल प्रबंधन किताबें ले जाते हैं और उन्हें किराए का भुगतान किया जाता है। 

योगेश शर्मा, जिला परियोजना समन्वयक

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