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दिग्विजय सिंह बनाम उमा भारती: 2003 के चुनावी बयानों पर कानूनी शिकंजा कसा

 


जबलपुर। मध्य प्रदेश की राजनीति के दो दिग्गज चेहरों के बीच चल रहे कानूनी विवाद में अब न्यायपालिका ने कड़ा रुख अख्तियार किया है। पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के विरुद्ध दायर मानहानि के मुकदमे में जबलपुर स्थित हाईकोर्ट ने सख्त लहजे में निचली अदालत से जवाब मांगा है। न्यायालय ने इस प्रकरण की वर्तमान स्थिति को स्पष्ट करने के लिए स्टेटस रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं। इस आदेश के बाद वर्षों से ठंडे बस्ते में नजर आ रहे इस हाई-प्रोफाइल मामले में अचानक सरगर्मी बढ़ गई है।

​दिग्विजय सिंह की याचिका पर हुई सुनवाई

​यह कानूनी लड़ाई वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की ओर से शुरू की गई थी। उन्होंने उमा भारती के पुराने बयानों को आधार बनाकर उन पर मानहानि का आरोप लगाया था। हालिया सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने यह जानने में रुचि दिखाई कि निचली अदालत में इस केस की कार्यवाही किस स्तर पर पहुंची है और इसमें अब तक क्या प्रगति हुई है। कोर्ट की इस सक्रियता को इस बात का संकेत माना जा रहा है कि न्यायपालिका अब इस पुराने प्रकरण को निर्णायक मोड़ पर ले जाने की तैयारी में है। कानून के जानकारों का कहना है कि स्टेटस रिपोर्ट मिलने के बाद उमा भारती की कानूनी अड़चनें बढ़ सकती हैं।

​दो दशक पुराने चुनावी बयानों का विवाद

​इस पूरे विवाद की जड़ें वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव से जुड़ी हैं। उस समय प्रदेश के राजनैतिक वातावरण में आरोप-प्रत्यारोप का दौर चरम पर था। उमा भारती ने चुनावी सभाओं और विज्ञापनों के माध्यम से दिग्विजय सिंह के कार्यकाल और उनके व्यक्तित्व पर कई गंभीर प्रहार किए थे। दिग्विजय सिंह का तर्क था कि इन निराधार आरोपों से उनकी सामाजिक और राजनैतिक प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुंची है। इसी आधार पर उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। लगभग 23 वर्षों से चल रही इस कानूनी प्रक्रिया में कई बार उतार-चढ़ाव आए, लेकिन अब 27 अप्रैल को होने वाली अगली सुनवाई बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। 27 अप्रैल की तारीख को ही हाईकोर्ट इस लंबित मामले के भविष्य और अगली कार्यवाही की दिशा तय करेगा। स्थानीय प्रशासन और विधि विशेषज्ञों की नजर अब निचली अदालत द्वारा पेश की जाने वाली विस्तृत रिपोर्ट पर टिकी है।

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