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मुफ्त का 'स्मार्ट मीटर' या 820 करोड़ का 'करंट'...उपभोक्ताओं के लिए महंगा सौदा!


विधानसभा में मंत्री के आधिकारिक बयान को विशेषज्ञों ने बताया भ्रामक, अगले10 साल तक उपभोक्ता की जेब खाली करने की तैयारी, कई सवाल भी खड़े हो रहे

जबलपुर। मध्य प्रदेश  में इन दिनों स्मार्ट मीटर को लेकर घमासान मचा हुआ है। हाल ही में विधायक सुरेश राजे द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में प्रदेश के ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने विधानसभा में जो जानकारी दी है, उसे लेकर बिजली मामलों के जानकारों ने कड़ा विरोध जताया है। विशेषज्ञों का दावा है कि सदन में दी गई यह जानकारी न केवल भ्रामक है, बल्कि बिजली उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ने वाले अतिरिक्त बोझ को छिपाने की एक कोशिश है। ​जबलपुर के विद्युत मामलों के विशेषज्ञ एडवोकेट राजेंद्र अग्रवाल ने आंकड़ों और तथ्यों के साथ सरकार के दावों पर सवालिया निशान लगाया है।

क्या पूछा गया था सरकार से


विधायक सुरेश राजे ने ऊर्जा मंत्री से स्पष्ट सवाल किया था कि विद्युत उपभोक्ताओं के निवास पर पुराने सिंगल फेज और थ्री फेज मीटर हटाकर जो स्मार्ट मीटर लगाए जा रहे हैं, उनके लिए उपभोक्ताओं से कितनी राशि और किस प्रकार वसूली जाएगी? उन्होंने यह भी पूछा कि क्या चालू हालत वाले पुराने मीटरों को बिना उपभोक्ता की सहमति के बदलना उचित है? इसके जवाब में ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने लिखित में कहा कि पुराने मीटर के स्थान पर स्थापित हो रहे स्मार्ट मीटर हेतु उपभोक्ताओं से किसी भी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जा रहा है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि आरडीएसएस योजना के तहत पारदर्शी बिलिंग और सटीक ऊर्जा लेखांकन के लिए ये मीटर लगाए जा रहे हैं और इसके लिए उपभोक्ता की सहमति की वैधानिक आवश्यकता नहीं है।

विशेषज्ञों का पलटवार: 'मुफ्त' का दावा पूरी तरह भ्रामक

​ऊर्जा मंत्री के इस जवाब को विद्युत मामलों के विशेषज्ञ एडवोकेट राजेंद्र अग्रवाल ने पूरी तरह से गैर-जिम्मेदाराना और भ्रामक करार दिया है। अग्रवाल के अनुसार, सरकार भले ही सीधे तौर पर कोई इंस्टॉलेशन चार्ज नहीं ले रही है, लेकिन स्मार्ट मीटर की पूरी लागत, उसका लीज शुल्क और रखरखाव का खर्च आगामी 10 वर्षों तक टैरिफ (बिजली की दरों) में जोड़कर वसूला जाएगा।

820 करोड़ की भारी-भरकम मांग

​विशेषज्ञों ने तथ्यों के साथ खुलासा किया है कि विद्युत वितरण कंपनियों ने वर्ष 2026-27 की नवीनतम याचिका में विद्युत नियामक आयोग से 820 करोड़ रुपये की मांग की है। यह राशि सीधे तौर पर उपभोक्ताओं के टैरिफ में शामिल की जाएगी। इसका मतलब यह है कि जो मीटर आज मुफ्त बताए जा रहे हैं, उनकी किश्तें अगले एक दशक तक प्रदेश के करोड़ों उपभोक्ताओं को अपने बिजली बिल के माध्यम से चुकानी होंगी। ​मंत्री ने अपने जवाब में केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण और मध्य प्रदेश विद्युत प्रदाय संहिता-2021 के नियमों का हवाला देते हुए कहा कि स्मार्ट मीटर के लिए सहमति अनिवार्य नहीं है। लेकिन जानकारों का कहना है कि पुराने और सही चल रहे मीटरों को जबरन बदलना और उनकी लागत का बोझ बिना स्पष्ट जानकारी दिए जनता पर डालना नैतिक रूप से गलत है।

-​दोहरी वसूली का सच क्या है

​सवाल यह भी उठ रहा है कि जो पुराने मीटर उपभोक्ताओं ने खुद खरीदे थे या जिनका शुल्क वे पहले ही चुका चुके हैं, उन्हें बदलकर नए स्मार्ट मीटर थोपना क्या 'दोहरी वसूली' की श्रेणी में नहीं आता? जहाँ एक तरफ सरकार इसे तकनीकी सुधार बता रही है, वहीं दूसरी तरफ विशेषज्ञ इसे बिजली कंपनियों के फायदे और जनता के शोषण का एक नया तरीका मान रहे हैं। ​अब देखना यह होगा कि विधानसभा में उठे इस मुद्दे पर विपक्ष और बिजली विशेषज्ञ क्या रुख अपनाते हैं और क्या सरकार इस छिपी हुई वसूली पर कोई स्पष्टीकरण देगी।

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