जबलपुर। जिला खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग के भीतर हुए करोड़ों के घोटाले की जांच में एक नया मोड़ आ गया है। कलेक्टर राघवेंद्र सिंह के निर्देश पर चल रही उच्च स्तरीय जांच के दौरान यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि कलेक्ट्रेट कार्यालय से मामले से जुड़े मूल दस्तावेज ही गायब हो चुके हैं। इस घटना ने प्रशासनिक महकमे में हलचल पैदा कर दी है, क्योंकि गायब हुए कागजात ही इस पूरे घोटाले की मुख्य कड़ी माने जा रहे थे। प्रशासन अब इस बात की तहकीकात कर रहा है कि सुरक्षा घेरे के बीच से ये फाइलें आखिर कैसे बाहर निकलीं।
जांच के अंतिम चरण में हुआ खुलासा
यह पूरा मामला तब उजागर हुआ जब जांच अधिकारी अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप देने के करीब थे। प्रक्रिया के तहत संबंधित विभाग से मूल फाइलों की मांग की गई थी ताकि साक्ष्यों का मिलान किया जा सके। जब रिकॉर्ड रूम और संबंधित शाखाओं में इन फाइलों की तलाश की गई, तो वे अपनी जगह पर नहीं मिलीं। यह विडंबना ही है कि जिन दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां सूचना के अधिकार के तहत दो माह पहले ही किसी आवेदक को दी जा चुकी थीं, वे अब सरकारी रिकॉर्ड से नदारद हैं। इन्ही प्रतियों के आधार पर विभिन्न विभागों में शिकायतें भी दर्ज कराई गई थीं, लेकिन अब मूल प्रमाणों का गायब होना एक बड़ी साजिश की ओर इशारा कर रहा है।
वर्ष 2019 से 2023 के बीच की अनियमितताएं
भ्रष्टाचार का यह प्रकरण लगभग तीन वर्ष पुराना है। जांच के दायरे में वर्ष 2019-20 से लेकर 2022-23 के बीच हुए वित्तीय लेन-देन और विभागीय कार्य शामिल हैं। शुरुआती जांच में यह पाया गया है कि फर्जी दस्तावेजों के सहारे करोड़ों रुपयों का हेरफेर किया गया है। इसमें खाद्य विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत के साथ-साथ कुछ बाहरी तत्वों की सक्रिय भागीदारी के सबूत मिले हैं। इसके अलावा कृषि विभाग के कुछ अधिकारियों की भूमिका पर भी संदेह जताया जा रहा है। जांच का दायरा बढ़ने के साथ ही इसमें कई बड़े चेहरों के नाम सामने आने की उम्मीद थी, जिसे देखते हुए फाइलों की चोरी को साक्ष्य मिटाने की कोशिश माना जा रहा है।
जिम्मेदारी से बच रहे कलेक्ट्रेट के अधिकारी
दस्तावेज गायब होने की सूचना के बाद कलेक्ट्रेट में वरिष्ठ अधिकारी गहरी चिंता व्यक्त कर रहे हैं, वहीं निचले स्तर के कर्मचारी और कनिष्ठ अधिकारी एक-दूसरे पर दोषारोपण करने में लगे हैं। फिलहाल कोई भी जिम्मेदार अधिकारी इस विषय पर आधिकारिक बयान देने को तैयार नहीं है। फाइलों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार कर्मचारियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। कलेक्ट्रेट जैसे सुरक्षित स्थान से फाइलों का गुम होना यह दर्शाता है कि भ्रष्टाचार के तार काफी गहरे जुड़े हुए हैं। आशंका जताई जा रही है कि जांच के शिकंजे में फंसने के डर से ही कुछ प्रभावशाली लोगों ने मिलीभगत करके इन दस्तावेजों को वहां से हटवाया है।
भोपाल तक पहुंची भ्रष्टाचार की गूंज
इस हाई प्रोफाइल घोटाले की चर्चा अब केवल जबलपुर तक सीमित नहीं रही है, बल्कि प्रदेश की राजधानी भोपाल में भी इसे गंभीरता से लिया जा रहा है। शासन स्तर पर इस प्रकरण की बारीकी से निगरानी की जा रही है और कड़े कदम उठाने के संकेत मिले हैं। राजनीतिक गलियारों में भी इस घटनाक्रम को लेकर गहमागहमी तेज हो गई है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में न केवल गायब दस्तावेजों के मामले में एफआईआर दर्ज कराई जाएगी, बल्कि भ्रष्टाचार में शामिल अधिकारियों पर बड़ी कार्रवाई भी की जा सकती है। फिलहाल गायब फाइलों की तलाश और दोषियों की पहचान के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं।
