शिक्षित पत्नी को भरण-पोषण देने से कतरा रहे पति को हाई कोर्ट की फटकार
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया है कि पत्नी का उच्च शिक्षित होना पति को उसकी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता। कोर्ट ने पति की उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें उसने तर्क दिया था कि उसकी पत्नी एमए पास है और खुद कमा सकती है। जस्टिस अवनीन्द्र कुमार सिंह की बेंच ने इस मामले में कड़ी टिप्पणी करते हुए फैमिली कोर्ट के भरण-पोषण के आदेश को बरकरार रखा।
डिग्री बनाम जिम्मेदारी: कोर्ट का कड़ा रुख
मामले की सुनवाई के दौरान जब पति कमल ने दलील दी कि उसकी पत्नी पूनम ने राजनीति विज्ञान में मास्टर डिग्री हासिल की है और वह नौकरी कर सकती है, तो कोर्ट ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी। न्यायमूर्ति ने पूछा, "क्या आप चाहते हैं कि एक पढ़ी-लिखी महिला गुजारा भत्ते के इंतजार में सड़क पर भीख मांगे?" कोर्ट ने साफ किया कि केवल डिग्री होना भरण-पोषण से वंचित करने का आधार नहीं हो सकता।
देश में रोजगार की जमीनी हकीकत पर टिप्पणी
कोर्ट ने अपने फैसले में देश की वर्तमान आर्थिक और रोजगार स्थिति का भी जिक्र किया। जस्टिस सिंह ने कहा कि आज के समय में केवल डिग्री होने मात्र से नौकरी मिलना आसान नहीं है। योग्य युवाओं की संख्या और उपलब्ध नौकरियों के बीच बहुत बड़ा अंतर है। यह एक सर्वविदित तथ्य है जिसे साबित करने के लिए किसी सबूत की जरूरत नहीं है। अगर पत्नी अपने स्वाभिमान के लिए छोटा-मोटा काम कर भी रही है, तब भी पति अपनी कानूनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।
निचली अदालत के फैसले पर हाई कोर्ट की मुहर
यह विवाद जून 2021 में हुई शादी के बाद शुरू हुआ था, जिसमें पत्नी ने ससुराल वालों पर एफआईआर दर्ज कराई थी और अलग रहने लगी थी। इससे पहले रीवा की फैमिली कोर्ट ने 27 मई 2024 को पति को आदेश दिया था कि वह अपनी पत्नी को हर महीने 6000 रुपये गुजारा भत्ता दे। हाई कोर्ट ने इस आदेश को पूरी तरह न्यायसंगत बताते हुए पति को हर माह राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया है।
