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सद्व्यवहार से ही मानवता का पुष्प सुरभित होकर आत्मा से परमात्मा की यात्रा को साकार करता है


जबलपुर। श्री मज्जिनेन्द्र जिनबिम्ब पंचकलाणक प्रतिष्ठा-गजरथ महोत्सव के तीसरे दिन प्रथम कल्याणक गर्भ कल्याणक उत्तर रूप का विधान सम्पन्न् हुआ। इससे पूर्व दूसरे दिन गर्भ कल्याणक के पूर्व रूप का दिग्दर्शन हुआ था। जबकि गजरथ महोत्सव का शुभारंभ घटयात्रा व ध्वाजारोहण से किया गया था। तीसरे दिन रात्रि में दूसरा कल्याणक जन्म कल्याणक मनाया गया। 

इससे पूर्व संत शिरोमणि दिगम्बाराचार्य विद्यासागर महाराज के धर्मप्रभावक शिष्य मुनिश्री योगसागर महाराज और उनके शिष्यसंघ के मुनिश्री पूज्य सागर व निस्सीम सागर के प्रवचन हुए। मुनिश्री ने धर्मप्रभावना करते हुए कहा कि त्रिकाल और त्रिलोक में यह शाश्वत सत्य है कि संस्कार, सदाचार और सद्व्यवहार से ही मानवता का पुष्प सुरभित होकर आत्मा से परमात्मा की यात्रा साकार करता है।  

उन्होंने बताया कि गर्भ कल्याणक के पूर्व रूप में देवलोक को पता चलता है कि धरती पर तीर्थंकर का जन्म होने वाला है। जबकि उत्तर रूप में जनमानस को पता चलता है। इस प्रक्रिया में माता को 16 स्वप्न आते हैं। जिनसे अचंभित होकर जिज्ञासु माता अपने पति के पास जाती है और उत्तर प्राप्त करती है। 

ऐसे मनाया गया गर्भ कल्याणक का उत्तर रूप- प्रतिष्ठाचार्य ब्रह्मचारी विनय भैया, ब्रह्मचारी जिनेश भैया, ब्रह्मचारी नरेश भैया के निर्देशन में यही भाव गर्भ-कल्याणक के उत्तर रूप में साकार हुआ। माता मरु देवी ने महाराजा नाभिराय से पिछली रैन में दिखे 16 स्वप्न सुनाए, जिनके फल का विवेचन करते हुए महाराजा नाभिराय ने घोषणा की-''प्रिय मरुदेवी भारत भूमि धन्य है, तेरी कोख धन्य है, मेरा जीवन धन्य है, जो प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ ऋ षभदेव भगवान का जन्म होने वाला है। इस घोषणा के होते ही सारा पांडाल करतल ध्वनि से गुंजायमान हो गया। महाराजा नाभिराय के पावन दरबार में राजा का स्वरूप राज व्यवस्था दंड व्यवस्था का प्रभावी चित्रण हुआ। जिसका सार यह है राजा को राष्ट्र का हितकारी, मित्रों का उपकारी, सज्जन के लिए सुख कारी और दुष्ट-दुर्जन आतताई आदि शत्रुओं के प्रति भयकारी होना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि दुष्ट सत्य  से नहीं शक्ति से डरते हैं। वर्णी गुरुकुल में गर्भ-कल्याणक की क्रियाएं  ब्रहमचारी अन्न्ू भैया पंकज भैया, रविन्द्र भैया, चक्रेश भैया ने संपन्न् की। 

भक्तिरस में सराबोर हुए इन्द्र-इन्द्राणी व श्रावक- हजारों इन्द्र-इन्द्राणियों व श्रावकों को भक्ति-रस में सराबोर करते हुए संगीतमय पूजन ब्रह्मचारी त्रिलोक भैया ने सम्पन्न् कराया। जन्म कल्याणक में भी रात्रि 8बजे से ब्रह्मचारी त्रिलोक भैया के मंगल-प्रवचन हुए। 

पिसनहारी की मढ़िया में कीर्ति-स्तम्भ लोकार्पित- संत शिरोमणि आचार्य गुरुदेव विद्यासागर महाराज के 50 वंे संयम स्वर्ण महोत्सव वर्ष में संयम स्वर्ण कीर्ति स्तंभ का पिसनहारी की मढ़िया में मुनि श्री योग सागर महाराज के पावन सानिध्य एवं ब्रह्मचारी जिनेश भैया, त्रिलोक भैया के निर्देशन में लोकार्पण हुआ। कार्यक्रम का संचालन अमित पडरिया ने किया।  

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