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वेतन आयोग के सामने केंद्रीय कर्मचारियों के न्यूनतम और अधिकतम वेतन में बढ़ता अंतर बना बड़ा मुद्दा, यूनियनों की मांग, अनुपात घटाएं

नई दिल्ली. केंद्र सरकार द्वारा गठित किए गए 8वें वेतन आयोग की समीक्षा प्रक्रिया आगे बढऩे के साथ ही, अब केंद्रीय कर्मचारियों के वेतन ढांचे में मौजूद एक बड़े असंतुलन पर बहस तेज हो गई है. कर्मचारी संगठनों और विभिन्न हितधारकों का ध्यान केवल कुल वेतन वृद्धि पर नहीं, बल्कि सरकारी सेवा के सबसे निचले और सबसे उच्च स्तर के अधिकारियों के मूल वेतन के बीच लगातार चौड़ी होती खाई पर है. पिछले दो वेतन आयोगों के दौरान इस न्यूनतम और अधिकतम वेतन के अनुपात में लगातार बढ़ोतरी हुई है, जिसके खिलाफ अब केंद्रीय कर्मचारी यूनियनों ने एक व्यापक संरचनात्मक सुधार की मांग उठानी शुरू कर दी है. 

कैसे बढ़ा न्यूनतम और अधिकतम वेतन का अंतर?

वेतन आयोगों के इतिहास पर नजर डालें तो छठे और सातवें वेतन आयोग के दौरान यह अंतर काफी ज्यादा बढ़ा है. छठे वेतन आयोग के तहत न्यूनतम बेसिक पे 7,000 रुपये प्रति माह तय की गई थी, जबकि अधिकतम बेसिक पे 80,000 रुपये थी। इस प्रकार सबसे कम और सबसे ज्यादा वेतन का अनुपात लगभग 11.4 गुना था.

जब सातवां वेतन आयोग लागू हुआ, तब न्यूनतम बेसिक सैलरी को बढ़ाकर 18,000  रुपये किया गया, लेकिन इसी अवधि में शीर्ष स्तर की अधिकतम बेसिक सैलरी सीधे 2.5 लाख प्रति माह तक पहुंच गई. विशेषज्ञों के अनुसार, जहां छठे वेतन आयोग से सातवें वेतन आयोग के बीच न्यूनतम मूल वेतन 7,000 से बढ़कर 18,000 हुआ, वहीं अधिकतम मूल वेतन 80,000 से बढ़कर 2.5 लाख हो गया। इसके परिणामस्वरूप, सबसे ऊंचे और सबसे निचले मूल वेतन का अनुपात 11.4 गुना से बढ़कर लगभग 13.9 गुना हो गया.

कर्मचारी संगठनों की मांग- 1:8 के पैमाने पर हो सुधार

वेतन के इस बढ़ते अंतर को लेकर विभिन्न कर्मचारी संघों ने नए वेतन आयोग के समक्ष अपनी प्रारंभिक प्रस्तुतियां देना शुरू कर दिया है. फेडरेशन ऑफ नेशनल पोस्टल ऑर्गनाइजेशन्स सहित कई प्रमुख कर्मचारी यूनियनों ने 8वें वेतन आयोग से सिफारिश की है कि इस बार न्यूनतम से अधिकतम वेतन के इस अनुपात को घटाकर कड़ाई से 1:8 के पैमाने पर लाया जाए. यूनियनों का तर्क है कि निचले स्तर के कर्मचारियों की तुलना में शीर्ष अधिकारियों के वेतन बैंड में असमान वृद्धि होने से कार्यबल के भीतर असंतोष और असमानता की भावना पैदा होती है. वेतन अंतर को सीमित रखने से न केवल विभागों के भीतर सामंजस्य सुधरेगा, बल्कि प्रवेश स्तर के कर्मचारियों को बढ़ती महंगाई और जीवन यापन की लागत से निपटने के लिए एक मजबूत वित्तीय सुरक्षा कवच मिल सकेगा.

आजादी के बाद से वेतन अनुपात का ऐतिहासिक सफर

भारत में प्रशासनिक वेतनमान के शीर्ष और निचले स्तर का अंतर्संबंध समय-समय पर बदलता रहा है. वर्ष 1946-47 में गठित पहले वेतन आयोग के दौरान यह अंतर अपने चरम पर था, जब अनुपात 1:36.4 था (न्यूनतम वेतन 55 और अधिकतम 2,000). इस अंतर को कम करने के प्रयास पांचवें वेतन आयोग (1996) के दौरान अपने सबसे सफल स्तर पर पहुंचे, जब यह अनुपात घटकर ऐतिहासिक रूप से सबसे कम, यानी 1:10.2 पर आ गया था. हालांकि, इसके बाद आए छठे और सातवें आयोग ने इस रुख को उलट दिया. उस समय सरकार का तर्क था कि निजी क्षेत्र के कॉर्पोरेट अधिकारियों के मुकाबले प्रशासनिक सेवाओं के शीर्ष अधिकारियों को प्रतिस्पर्धी और आकर्षक वेतन देना जरूरी है.

खजाने पर वित्तीय बोझ और आयोग की चुनौती

8वें वेतन आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती कर्मचारियों की इन उम्मीदों और देश की वास्तविक आर्थिक स्थिति के बीच एक सही संतुलन साधने की है. इस आयोग की सिफारिशों का सीधा असर देश के लगभग 50 लाख सक्रिय केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों और 65 लाख से अधिक पेंशनभोगियों पर पडऩे जा रहा है.

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