हालांकि यह डिजिटल प्रक्रिया पिछले एक साल से प्रभावी है, लेकिन कई मामलों में अभी भी फिजिकल (कागजी) रेफरल पेपर का इस्तेमाल हो रहा था। अब मुख्यालय ने इस पर पूरी तरह रोक लगाते हुए डिजिटल मॉड्यूल को अनिवार्य कर दिया है।
ये बातें हैं बेहद जरूरी
रेलवे ने कर्मचारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वे सुचारू इलाज के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें:
कार्ड अपडेट रखें: कर्मचारी समय-समय पर अपना उम्मीद कार्ड अप-टू-डेट करें और उसकी समाप्ति तिथि की जांच करते रहें।
मोबाइल नंबर अपडेट: परिवार के सभी सदस्यों के मोबाइल नंबर उम्मीद रिकॉर्ड में सही और अपडेट होने चाहिए।
ओटीपी आधारित सत्यापन: मरीज का पंजीकरण उम्मीद कार्ड नंबर से होगा और सत्यापन के लिए पंजीकृत मोबाइल नंबर पर ओटीपी भेजा जाएगा। इसी ओटीपी के आधार पर अनुबंधित निजी अस्पताल मरीज को स्वीकार करेंगे।
आपात स्थिति में क्या होंगे नियम?
आपातकालीन स्थिति में यदि कोई मरीज सीधे निजी अस्पताल जाता है, तो वहां भी उम्मीद कार्ड से पंजीकृत मोबाइल पर ओटीपी के जरिए ही सत्यापन होगा। अस्पताल मरीज को भर्ती कर ऑनलाइन अनुमोदन के लिए रेलवे अस्पताल को रिक्वेस्ट भेजेगा, जिसे 24 घंटे के भीतर अनुमोदित या अस्वीकृत करना होगा।
मरीजों को मिलेगी ये बड़ी राहत
अस्पताल के चक्करों से मुक्ति: अब मरीज के परिजनों को रेफरल या अप्रूवल के लिए बार-बार रेलवे अस्पताल जाने की जरूरत नहीं होगी। यह प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल होगी।
कैशलेस सुविधा: इलाज पूरा होने के बाद डिस्चार्ज विवरण और बिलिंग का कार्य ई-रेफरल पोर्टल के जरिए डिजिटल रूप से होगा। मरीज या परिजनों से कोई अग्रिम भुगतान नहीं लिया जाएगा।
पारदर्शिता: डिस्चार्ज से लेकर मामले के समापन तक की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन प्रबंधित की जाएगी, जिससे पारदर्शिता बढ़ेगी।
