आर्थिक अपराध शाखा की जांच से खुलाभ्रष्टाचार का कच्चा चिट्ठा
इस हाई-प्रोफाइल मामले की जड़ें आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) जबलपुर की प्राथमिक जांच में निहित हैं। ईओडब्ल्यू ने साल 2025 में एफआईआर संख्या 111/2025 दर्ज कर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत कार्रवाई शुरू की थी। शुरुआती जांच में यह पाया गया कि आरोपी ने 01.01.2015 से लेकर 20.06.2025 के मध्य सरकारी सेवा में रहते हुए अपनी वास्तविक आय से कहीं अधिक संपत्ति खड़ी कर ली थी। आय और व्यय के बीच भारी अंतर को देखते हुए ईडी ने धन शोधन निवारण अधिनियम के प्रावधानों के तहत मामला अपने हाथ में लिया और काली कमाई के निवेश रास्तों की पड़ताल शुरू की।
बैंकिंग चैनल के जरिए अवैध कमाई को निवेश करने का खुलासा
प्रवर्तन निदेशालय की गहरी छानबीन में यह तथ्य सामने आया कि भ्रष्टाचार के माध्यम से प्राप्त नकदी को ठिकाने लगाने के लिए एक सोची-समझी रणनीति अपनाई गई थी। आरोपी ने पहले अवैध नकदी को बैंकिंग प्रणाली में प्रवेश कराया और उसके बाद उस राशि का उपयोग अचल संपत्तियों की खरीद में किया। जांच एजेंसी ने तफ्तीश के दौरान भोपाल, मंडला, उमरिया और सिवनी जैसे चार प्रमुख जिलों में फैले विशाल निवेश नेटवर्क को चिह्नित किया। इन क्षेत्रों में खरीदे गए भूखंडों, मकानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के वित्तीय रिकॉर्ड आरोपी की आधिकारिक आय से मेल नहीं खाते हैं।
चार जिलों की करोड़ों की बेनामी संपत्तियों पर हुई जब्ती
ईडी की अब तक की गणना के अनुसार अपराध से अर्जित कुल संपत्ति का मूल्य 11.81 करोड़ रुपये आंका गया है। जांच एजेंसी ने प्रभावी कदम उठाते हुए फरवरी 2026 में ही इन सभी संपत्तियों को अस्थाई रूप से कुर्क करने की प्रक्रिया पूरी कर ली थी। चार्जशीट में उल्लेख किया गया है कि आरोपी ने अपराध की कमाई को बेदाग और वैध संपत्ति के रूप में प्रदर्शित करने का प्रयास किया, जो पीएमएलए की धारा 3 के तहत एक दंडनीय अपराध है। भ्रष्टाचार के धन को मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था में शामिल करने के इस षड्यंत्र को लेकर न्यायालय ने अब सख्त रुख अपनाते हुए आगे की न्यायिक कार्यवाही तेज कर दी है।
