नई दिल्ली। रेलवे ने अपने लाखों कर्मचारियों और उनके आश्रितों के हित में बड़ा निर्णय लिया है। उसने अब यह पूरी तरह साफ कर दिया है कि किसी मृत रेल कर्मचारी-अधिकारी की दूसरी पत्नी से उत्पन्न संतान को अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने से अब मना नहीं किया जा सकेगा।
अब तक रेलवे में अनुकंपा नियुक्ति को लेकर एक बड़ी दुविधा बनी हुई थी। अक्सर देखा जाता था कि यदि किसी रेल कर्मचारी व अधिकारी की दो पत्नियां हैं तो दूसरी पत्नी के बच्चों को नौकरी देने के मामले में रेलवे प्रशासन बहुत ही सख्त रुख अपनाता था। कई मामलों में तो आवेदन केवल इसलिए निरस्त कर दिए जाते थे क्योंकि कर्मचारी ने दूसरी शादी के लिए विभाग से अनुमति नहीं ली थी या फिर नियम स्पष्ट नहीं थे। इसका परिणाम यह होता था कि पिता के साये से वंचित बच्चों को अपना हक पाने के लिए वर्षों तक अदालतों के चक्कर काटने पड़ते थे। नियमों की गलत और संकुचित व्याख्या ने कई परिवारों को आर्थिक तंगी के दलदल में धकेल दिया था।
नया स्पष्टीकरण और वर्ष 2018 का संदर्भ
रेलवे बोर्ड ने अपने नए आदेश में उस भ्रम को पूरी तरह दूर कर दिया है, जो 11 दिसंबर 2018 की तारीख को लेकर बना हुआ था। दरअसल वर्ष 2018 में एक नीतिगत बदलाव किया गया था, जिसमें दूसरी पत्नी की संतान को अनुकंपा नियुक्ति के लिए पात्र माना गया था। हालांकि रेलवे के कई जोनल कार्यालय और विभाग इस नियम को लागू करने में आनाकानी कर रहे थे। वे यह तर्क देते थे कि यदि रेल कर्मचारी की मृत्यु 2018 से पहले हुई है, तो उन पर यह नया नियम लागू नहीं होगा।
आवेदक का निर्णय योग्यता के आधार पर होगा
रेलवे बोर्ड ने अब फटकार लगाते हुए स्पष्ट किया है कि कारण (कर्मचारी की मृत्यु) चाहे कभी भी हुआ हो, यदि आवेदन 11 दिसंबर 2018 के बाद जमा किया गया है, तो उसे पुरानी तारीखों का हवाला देकर खारिज नहीं किया जा सकता। प्रशासन को अब प्रत्येक आवेदक का निर्णय उसकी योग्यता (मेरिट) के आधार पर करना होगा, न कि फाइलों में दर्ज तारीखों के फेर में उलझकर।
पीडि़त पक्ष को लाभ पहुंचाने का प्रयास करें
बोर्ड का मानना है कि नियमों का पालन जरूरी है, लेकिन वे नियम किसी अनाथ बच्चे के भविष्य के रास्ते का पत्थर नहीं बनने चाहिए। अब प्रशासन को निर्देश दिए गए हैं कि वे आवेदनों को सहानुभूति के साथ देखें और जहाँ तक संभव हो, पीडि़त पक्ष को लाभ पहुंचाने का प्रयास करें।
अदालती मुकदमों से मिलेगी मुक्ति
यह स्पष्टीकरण रेलवे के लिए भी फायदेमंद साबित होगा। वर्तमान में देश की विभिन्न अदालतों और केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरणों (कैट) में ऐसे हजारों मामले लंबित हैं जहां दूसरी पत्नी की संतान अपने हक की लड़ाई लड़ रही है। इस स्पष्ट आदेश के बाद अब रेलवे को बेवजह की मुकदमेबाजी से राहत मिलेगी और सरकारी धन व समय की बचत होगी। वहीं दूसरी ओर, पीडि़त परिवारों को अब वकील की फीस और कोर्ट की तारीखों से छुटकारा मिलकर सीधे रोजगार का अवसर प्राप्त होगा।
रेलवे ने अनुकंपा नियुक्ति की स्थिति स्पष्ट की
रेलवे बोर्ड ने हाल ही में एक नया सर्कुलर (आरबीई नं. 08/2026) 21 जनवरी 2026 को जारी किया है, जिसमें मृतक रेलवे कर्मचारियों की दूसरी पत्नी से हुए बच्चों की अनुकंपा नियुक्ति (कंपैशनेट अपॉइंटमेंट) को लेकर स्थिति पूरी तरह साफ कर दी गई है।
पुराना नियम और भ्रम
पहले 2018 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले (वीआर त्रिपाठी बनाम यूनियन आफ इंडिया) के बाद यह नियम बना था कि दूसरी पत्नी के बच्चे भी नौकरी के हकदार हैं। लेकिन कई रेलवे विभाग इस नियम को सही से लागू नहीं कर रहे थे और पुराने मामलों को खारिज कर रहे थे। अब इसी में बदलाव हुआ है। रेलवे बोर्ड ने साफ आदेश दिया है कि अगर किसी ने 11 दिसंबर 2018 के बाद आवेदन किया है, तो उसे केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि कर्मचारी की मृत्यु उस तारीख से पहले हुई थी।
आदेश जोनल मैनेजरों व प्रोडक्शन यूनिट्स को भेजा गया
यदि किसी दिवंगत रेल कर्मचारी की दूसरी पत्नी की संतान ने नौकरी के लिए आवेदन किया है और उसे यह कहकर मना कर दिया गया था कि मामला पुराना है या तारीख निकल गई है, तो अब उनके लिए रास्ते खुल गए हैं। विभाग को अब उन फाइलों पर फिर से विचार करना होगा। यह आदेश रेलवे के सभी जोनल मैनेजर और प्रोडक्शन यूनिट्स को भेज दिया गया है ताकि भविष्य में अनावश्यक कानूनी मुकदमों से बचा जा सके।
रेलवे बोर्ड ने स्पष्ट किया है
बोर्ड ने इस पत्र के माध्यम से सभी जोनल मैनेजरों को सख्त निर्देश दिए हैं। तारीख की बाधा खत्म यदि आवेदन 11 दिसंबर 2018 के बाद मिला है, तो उसे केवल इस आधार पर रिजेक्ट नहीं किया जा सकता कि कर्मचारी की मौत इस तारीख से पहले हुई थी। अब गुण-दोष (मेरिट) पर फैसला होगा। हर केस की जांच उसकी अपनी परिस्थितियों के आधार पर होगी। सिर्फ पुरानी तारीख बताकर फाइल बंद नहीं की जाएगी। अगर आवेदन करने में समय ज्यादा बीत गया है, तो अधिकारियों को आदेश दिया गया है कि वे देरी को माफ करने की अपनी शक्ति का इस्तेमाल करें और मामले को सहानुभूति पूर्वक देखें।
