जबलपुर। कृष्ण पक्ष की अजा एकादशी आज सोमवार को है। इस एकादशी में भगवान श्री हरि विष्णु और माता लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं के मुताबिक मंत्रोचार और दान से संकट का निवारण हो जाता है।
कथावाचक पंडित कामता प्रसाद तिवारी ने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक अजा एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के समस्त पापों का नाश होता है। जीवन में सुख-समृद्धि आती है। संकटों से मुक्ति मिलती है। इस दिन व्रत रखने के साथ ही अजा एकादशी की कथा सुनना और पढ़ना अत्यंत शुभ माना जाता है।
ये है पौराणिक व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में राजा हरिश्चंद्र एक अत्यंत प्रतापी और धर्मपरायण राजा थे। उनके राज्य में वैभव और प्रजा के लिए सुख.सुद्धि की कोई कमी नहीं थी। हालांकिए, कालचक्र के प्रभाव से उनके जीवन में ऐसा विकट समय आया कि उन्हें अपना राज्यए, धन-संपत्ति और परिवार तक छोड़ना पड़ा। जीवनयापन के लिए उन्हें एक चांडाल के यहां दास के रूप में कार्य करना पड़ा, लेकिन इसके बाद भी उन्होंने सत्य और धर्म का मार्ग कभी नहीं छोड़ा। घोर दुखों के इस दौर में राजा हरिश्चंद्र की मुलाकात गौतम ऋषि से हुई। राजा ने ऋषि को नमन कर अपने सारे कष्टों के बारे में बताया। तब महर्षि गौतम ने उन्हें भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अजा एकादशी का व्रत पूरी श्रद्धा और नियमपूर्वक करने की सलाह दी। गौतम ऋषि की आज्ञा मानकर राजा हरिश्चंद्र ने विधि-विधान से अजा एकादशी का व्रत किया और भगवान विष्णु की पूजा.अर्चना की। इस व्रत के प्रभाव से राजा हरिश्चंद्र के सभी कष्ट समाप्त हो गए। उन्हें अपना खोया हुआ राज्य, धन-संपत्ति और परिवार वापस मिल गया। अंत काल में भगवान विष्णु की कृपा से उन्हें मोक्ष प्राप्त हुआ और वे वैकुण्ठ धाम चले गए।
पूजा विधि : अजा एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान से निवृत्त होकर भगवान विष्णु का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें। पूजा स्थल की साफ-सफाई करने के बाद वहां भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद भगवान विष्णु को पीले वस्त्र अर्पित करें, पीले फूल चढ़ाएं और गंगाजल से उनका अभिषेक करें। धूप-दीप प्रज्वलित कर भगवान को फल, मिठाई और सात्विक सामग्रियों का भोग लगाएं।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप शुभ
दिनभर ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करना शुभ माना जाता है। शाम को आरती करें या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें तथा व्रत कथा अवश्य पढ़ें या सुनें। अगले दिन द्वादशी तिथि पर पूजा के पश्चात पारण करें। अपनी सामर्थ्य अनुसार जरूरतमंदों या ब्राह्मणों को अन्न, वस्त्र और अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान दें।
