जबलपुर। जबलपुर के एमआर-4 विजय नगर के पास लक्ष्मीपुर बस्ती से 200 से 250 परिवारों को बेदखल करने के विवाद पर मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधिपति विशाल मिश्रा की एकलपीठ में शनिवार 19 सितंबर को अंतिम बहस पूरी हो गई। इस मामले में जबलपुर नगर निगम, जबलपुर विकास प्राधिकरण, केसरवानी शिक्षा समिति तथा झुग्गीवासियों की ओर से डेमोक्रेटिक लॉयर्स फोरम के सचिव अधिवक्ता रविंद्र गुप्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता शशांक शेखर ने अपने-अपने तर्क प्रस्तुत किए। सभी पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के उपरांत अदालत ने प्रकरण में अपना अंतिम फैसला सुरक्षित रख लिया।
तालाब भूमि अधिग्रहण और पुराने पट्टों का इतिहास
हाईकोर्ट के समक्ष अधिवक्ताओं ने दस्तावेज पेश करते हुए स्पष्ट किया कि संबंधित 8 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण वर्ष 1990 में जेडीए ने किया था। मास्टर प्लान में इस भूखंड के जलभराव वाले तालाब के मूल स्वरूप को समाप्त करके आवासीय प्रयोजन हेतु प्रस्तावित किया गया था। इस क्षेत्र में बसे कुल बाशिंदों में से करीब 40 प्रतिशत लोगों के पास बाकायदा वैध पट्टे मौजूद हैं, जो उन्हें तत्कालीन सरकारी प्रावधानों के अंतर्गत नगरीय क्षेत्र के भूमिहीन व्यक्तियों की श्रेणी में प्रदान किए गए थे।
कार्रवाई पर स्थगन और वैधानिक पुनर्वास की मांग
प्रशासन ने 23 जुलाई को अचानक अतिक्रमण हटाने की मुहिम प्रारंभ की थी, जिसके खिलाफ हस्तक्षेपकर्ताओं ने कड़ा ऐतराज जताया। बिना किसी वैकल्पिक आश्रय अथवा क्षतिपूर्ति के गरीबों को बेघर करने की इस प्रशासनिक कोशिश को चुनौती मिलने पर अदालत ने घरों को ढहाने तथा बिजली आपूर्ति विच्छेद करने पर रोक लगा दी थी। पिछले 20 वर्षों के दौरान यहां डामर रोड, पेयजल पाइपलाइन और विद्युत नेटवर्क जैसी बुनियादी नागरिक सुविधाएं बाकायदा सरकारी बजट से मुहैया कराई गईं। अधिवक्ताओं ने संविधान प्रदत्त जीवन के अधिकार का हवाला देते हुए मांग रखी कि शेष बेसहारा निवासियों को भी सरकार की प्रचलित धारणाधिकार योजना का लाभ देकर नियमित किया जाए और किसी को भी बिना तय कानूनी प्रक्रिया के बेदखल न किया जाए।
