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धर्मशास्त्र लॉ यूनिवर्सिटी: शिकंजे में फर्जीवाड़े के सूत्रधार, कुलसचिव की रिपोर्ट करेगी बड़े घोटाले का खुलासा



जबलपुर। धर्मशास्त्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में संविदा नियुक्तियों और आउटसोर्सिंग अनुबंधों में हुए कथित भ्रष्टाचार के मामले ने तूल पकड़ लिया है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान तत्कालीन प्रभारी कुलसचिव जलज गोटिया की भूमिका और कार्यप्रणाली भी संदेह के दायरे में है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने वर्ष 2021 में हुई भर्ती प्रक्रिया और पिछले 7 वर्षों से जारी आउटसोर्सिंग कार्यों की जांच शुरू कर दी है। कुलपति के कड़े रुख के बाद वर्तमान प्रभारी कुलसचिव डॉ. प्रवीण त्रिपाठी ने संबंधित फाइलों का सूक्ष्म परीक्षण आरंभ कर दिया है। प्राथमिक तौर पर यह सामने आया है कि चयन प्रक्रिया के दौरान नियमों की अनदेखी कर कुछ विशेष व्यक्तियों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया।

​विज्ञापन की शर्तों और पात्रता मापदंडों में गंभीर खामियां

​जांच के घेरे में मुख्य रूप से वर्ष 2021 में पर्सनल असिस्टेंट के पद के लिए जारी किया गया विज्ञापन है। इस विज्ञापन में अनिवार्य शैक्षणिक योग्यता और आयु सीमा का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया था। नियमों के इस अभाव को सोची-समझी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है ताकि अपात्र व्यक्तियों के चयन का रास्ता साफ हो सके।  दस्तावेजों की पड़ताल से यह संकेत मिल रहे हैं कि भर्ती के समय पारदर्शिता के बजाय व्यक्तिगत प्राथमिकताओं को अधिक महत्व दिया गया।

​साक्षात्कार और वेतनमान निर्धारण में अनियमितताएं

​भर्ती पद्धति पर सवाल उठाते हुए यह तथ्य प्रकाश में आया है कि महत्वपूर्ण पदों के लिए लिखित परीक्षा या कौशल परीक्षण आयोजित करने के बजाय केवल साक्षात्कार के आधार पर नियुक्तियां की गईं। चयनित उम्मीदवार के लिए तय किया गया पे-ग्रेड विश्वविद्यालय के स्थापित मानकों से काफी अधिक रखा गया। चौंकाने वाली बात यह है कि जिस व्यक्ति का चयन किया गया, वह पहले से ही आउटसोर्स के माध्यम से उसी संस्थान में कार्यरत था। वेतन निर्धारण और पद की पात्रता में इस तरह की विसंगतियां सीधे तौर पर वित्तीय अनियमितताओं की ओर इशारा कर रही हैं, जिसकी गहराई से जांच की जा रही है।

​आउटसोर्सिंग अनुबंधों का नवीनीकरण और भुगतान विवाद

​संविदा नियुक्तियों के अलावा आउटसोर्सिंग व्यवस्था में भी व्यापक गड़बड़ी मिली है। नियमानुसार किसी भी बाहरी एजेंसी का अनुबंध अधिकतम 3 वर्ष की अवधि के लिए ही हो सकता है, परंतु यहां एक ही एजेंसी पिछले 7 वर्षों से निरंतर कार्य कर रही है। नई निविदाएं आमंत्रित किए बिना पुराने अनुबंध को जारी रखना प्रशासनिक मिलीभगत का प्रमाण माना जा रहा है। इसके साथ ही आउटसोर्स कर्मचारियों के वेतन वितरण में भी भारी भेदभाव पाया गया है। मध्य प्रदेश शासन द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन की तुलना में कुछ विशेष लिपिकों को दोगुनी राशि का भुगतान किया गया। डॉ. प्रवीण त्रिपाठी ने आश्वस्त किया है कि रिकॉर्ड के आधार पर निष्पक्ष रिपोर्ट तैयार कर दोषियों के विरुद्ध कठोर वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।

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